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कुण्डलिया- हिंदी दिवस के सम्बन्ध में

हिन्दी तो अनमोल है, मीठी सुगढ़ सुजान।
देवतुल्य पूजन करो, मात-पिता सम मान।।
मात-पिता सम मान, करो इसकी सब सेवा।
मिले मधुर परिणाम, कि जैसे फल औ मेवा।।
कहे पवन ये बात, सुहागन की ये बिन्दी।
इतराता साहित्य, अगर भाषा हो हिन्दी।१।

 

दुर्दिन जो हैं दिख रहे, इनके कारण कौन।
सबकी मति है हर गई, सब ठाढ़े हैं मौन।।
सब ठाढ़े हैं मौन, बांध हाथों को अपने।
चमत्कार की आस, देखते दिन में सपने।।
सुनो पवन की बात, प्रीत ना होती उर बिन।
होती सच्ची चाह, न आते इसके दुर्दिन।२।

 

सरकारी अनुदान में, हिन्दी को बइठाय।
अँग्रेजी प्लानिंग करें, ग्रोथ कहाँ से आय।।
ग्रोथ कहाँ से आय, ट्रबल में हिंदी अपनी।
मदर टन्ग असहाय, यही बस माला जपनी।।
कहे पवन कविराय, करें ये बस मक्कारी।
हिंदी कोसे भाग्य, देख फाइल सरकारी।३।

 

जब सोंचे हिन्दी सभी, हिन्दी में हो काम।
हिन्दी में ही बात हो, भली करेंगे राम।।
भली करेंगे राम, बढ़ेगी हिंदी तबही।
हिंदी में हर लेख, करो ये निश्चय अबही।।
हिंदी कोमल जीव, विदेशी मिल सब नोंचे।
होगी ये बलवान, सभी मिलकर जब सोंचे।४।

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(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by डॉ पवन मिश्र on September 19, 2016 at 4:39pm

आद. अशोक जी,,,कुण्डलिया छन्द को पसंद करने के लिये हृदय तल से आभार

Comment by Ashok Kumar Raktale on September 18, 2016 at 11:45pm

आदरणीय डॉ. पवन मिश्र जी सादर, हिंदी पर रचे सभी कुण्डलिया छंद उत्तम हुए हैं. बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें. सादर.

Comment by डॉ पवन मिश्र on September 15, 2016 at 8:22pm
आद. सुरेश जी, पंक्तियां आप तक पहुंची। मान देने के लिये आभार आपका
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 15, 2016 at 8:18pm
आदरणीय पवन मिश्र जी बहुत ही सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई प्रेषित है । सादर ।
Comment by डॉ पवन मिश्र on September 15, 2016 at 8:09pm
आद. सौरभ जी। लिखना सार्थक हो गया। गूगल से सर्च करके छन्दों पर आपके ओबीओ पर लिखे लेख पढ़कर ही सीखते और प्रयास करते हैं। मने आप द्रोणाचार्य सरीखे हैं हमारे छन्द लेखन के लिये। हृदय तल से आभार।।।
Comment by डॉ पवन मिश्र on September 15, 2016 at 8:05pm
आद. अल्का जी बहुत बहुत आभार आपका

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 15, 2016 at 7:04pm

आदरणीय पवन जी, आपकी कुण्डलिया रचनाओं से मेरा पहली बार सामना हो रहा है. कहना न होगा शिल्पपक्ष पर आपकी पकड़ देख कर मन मुग्ध है. यह अवश्य है, रचना-यात्रा अब शुरु हो रही है. आप पंक्तियों की तार्किकता और उसके भावपक्ष पर अपना ध्यान केन्द्रित करें. क्योंकि छन्द-शिल्प के प्रति आप अत्यंत आश्वस्त दिख रहे प्रतीत हो रहे हैं. 

सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक शुभकमनाएँ और बधाइयाँ, आदरणीय

शुभेच्छाएँ 

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 15, 2016 at 5:54pm

वाह्ह्ह्हह......बहुत सुन्दर कुंडलिया छंद  पवन जी ..बहुत बहुत बधाई 

Comment by डॉ पवन मिश्र on September 15, 2016 at 5:51pm

आद. राम शिरोमणि जी, मीना पाठक जी, जनाब समर साहब, राजेश कुमारी जी,,,आप सबका हृदय तल से आभार। परिष्करण हेतु सुझावों की अपेक्षा सँग पुनः आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 15, 2016 at 4:38pm

वाह्ह्ह्हह  वाह्ह्ह्ह  हिन्दी के सम्मान में शिल्पबद्ध सार्थक कुण्डलियाँ लिखी हैं आद० डॉ० पवन जी दिल से बहुत बहुत बधाई लीजिये | 

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