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ज़िंदगी को छलने लगी .....

ज़िंदगी को छलने लगी .....

गज़ब हुआ
एक चराग़ सहर से
शब की चुगली कर बैठा
एक लिबास
अपने ग़म की
तारीकियों से दरयाफ़्त कर बैठा
कोई करीबियों से
फासलों की बात कर बैठा

मैंने तो
तमाम रातों के चांद
उस पर कुर्बान कर दिए थे
अपने ग़मग़ीन पैरहन पर
हंसी के पैबंद सिल दिए थे
अपनी आंखों के हमबिस्तर को
मैं चश्मे साहिल पे ढूंढती रहा
नसीमे सहर से
उसका पता पूछती रही

उम्मीदों की दहलीज़
नाउम्मीदी की दीवारों से
बंद होने लगी
सांसें ज़िस्म को
बैसाखियों सी लगनी लगी
जिसको हयात समझी थी
वो बन के क़बा मौत की
ज़िंदगी को छलने लगी


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 411

Comment

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Comment by Sushil Sarna on July 3, 2016 at 1:21pm

अादरणीय डॉ. गोपाल जी भाई साहिब प्रस्तुति मेंं निहित भावों को समर्थन देती अापकी अात्मीय स्नेहाशीष का तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 2, 2016 at 8:56pm

बहुत खूबसूरत आ० सरना जी मैंने तो
तमाम रातों के चांद
उस पर कुर्बान कर दिए थे
अपने ग़मग़ीन पैरहन पर
हंसी के पैबंद सिल दिए थे
अपनी आंखों के हमबिस्तर को
मैं चश्मे साहिल पे ढूंढती रहा
नसीमे सहर से
उसका पता पूछती रही

Comment by Sushil Sarna on July 1, 2016 at 8:04pm

अादरणीया राजेश कुमारी जी प्रस्तुति मे निहित भावों को सहमति देती अापकी अात्मीय प्रशंसा एवं सुझाव का हार्दिक अाभार। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 1, 2016 at 6:39pm

मैंने तो 
तमाम रातों के चांद 
उस पर कुर्बान कर दिए थे 
अपने ग़मग़ीन पैरहन पर 
हंसी के पैबंद सिल दिए थे 
अपनी आंखों के हमबिस्तर को 
मैं चश्मे साहिल पे ढूंढती रहा 
नसीमे सहर से 
उसका पता पूछती रही--वाह्ह्ह्ह  वाह्ह्ह्ह 

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति लाजबाब आद० सुशील सरना जी ढेरों बधाई लीजिये 

बैसाखियों सी लगनी लगी ---बैसाखियाँ सी लगने  लगी  --कर  लीजिये 

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