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आइना सब को दिखाते हैं कभी खुद देखिये

२१२२  ११२२   ११२२   २१२  

आइना सब को दिखाते हैं कभी खुद देखिये 

क्यूँ लगी ये आग हरसू आप खुद ही सोचिये 

हुक्मरानों ने खता की बच्चों से बचपन छिना 

अब्बू ना लौटेंगे चाहे लाख आंसू पोंछिये 

अम्मी के हाथों के सेवइ अम्मा के हाथों की खीर 

एक जैसा ही सुकू देती है खाकर देखिये 

दिल  हमीदों का न तोड़ो गर है कोई सिरफिरा 

मौत हिन्दी की हुई मत हिन्दू मुस्लिम बोलिये 

जो बचाने में लगा है इस वतन की आबरू 

हम बिरोधी उसके हैं या नीतियों के सोचिये 

जिस सपोले को पिलाकर दूध जहरीला किया 

है उठाये फन खड़ा तो आँख यूं मत फेरिये 

हम है हिन्दू वो मुस्लिम ये पता सदियों से था 

पर हमें दुश्मन बताकर रोटियाँ मन सेंकिए 

जिस वतन से आप खुद है आपकी ये आबरू 

क्या यही सीखा है पीकर दूध माँ को बेंचिए 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by maharshi tripathi on June 16, 2016 at 10:11pm
बहूत बेहतरीन गज़ल,दाद कूबूले,सर !!!
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 15, 2016 at 10:47pm

अम्मी के हाथों के सेवइ अम्मा के हाथों की खीर
एक जैसा ही सुकू देती है खाकर देखिये....वाह आदरणीय वाह बहुत ही खूबसूरत

Comment by kanta roy on June 15, 2016 at 9:09pm

आइना सब को दिखाते हैं कभी खुद देखिये 

क्यूँ लगी ये आग हरसू आप खुद ही सोचिये ---बहुत  खूब कही  है  आपने  आदरणीय डॉ आशुतोष जी .बधाई 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 15, 2016 at 5:04pm

आदरणीय श्याम नारायण जी ..रचना पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से आभारी हूँ सादर 

Comment by Shyam Narain Verma on June 15, 2016 at 3:07pm

जिस वतन से आप खुद है आपकी ये आबरू 

क्या यही सीखा है पीकर दूध माँ को बेंचिए 

इस खूबसूरत रचना के लिये दिली दाद कुबूल करें   आदरणीय | सादर 
Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 15, 2016 at 12:46pm

आदरणीय गिरिराज भाईसाब ..रचना पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से आभारी हूँ ..आपके मशविरे पर अमल करूगा बह्र गलती से गलत हो गयी उसमे सुधार कर लूँगा सादर प्रणाम के साथ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 15, 2016 at 11:38am

आदरनीय आशुतोष भाई , अच्छी ग़ज़ल कही है , गज़ल के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ।

ऊपर बह्र आपने ग़लत लिख दी है , सुधार लीजियेगा ।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 14, 2016 at 10:53am

आदरणीय तेज वीर सर ..रचना पर आपकी प्रतिकिर्या के लिए हृदय से आभारी हूँ ..भूल बश हुयी गलती को मैं सुधार लूँगा /

Comment by TEJ VEER SINGH on June 13, 2016 at 6:22pm

हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ आशुतोष जी! बेहतरीन गज़ल!

हम है हिन्दू वो मुस्लिम ये पता सदियों से था 

पर हमें दुश्मन बताकर रोटियाँ मन सेंकिए!

 मैंने जो शेर शेयर किया है उसमें "रोटियाँ मत सेकिये" होगा! गल्ती से मन लिखने में आ गया है!

Comment by Mahendra Kumar on June 13, 2016 at 4:29pm
अम्मी के हाथों के सेवइ अम्मा के हाथों की खीर
एक जैसा ही सुकू देती है खाकर देखिये
...उम्दा ग़ज़ल!

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