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कुछ लम्हे ....

वो कुछ लम्हे
जो हमने मिलकर
अपनी झोली फैलाकर
ख़ुदा की हर चौखट पर
सर झुकाकर
मांगे थे //

वो कुछ लम्हे
जो हमारे ज़हन में
आज तक
इक दूसरे के वास्ते
वक्ते इज़हार के इंतज़ार में
ज़िंदा हैं //

वो कुछ लम्हे
जो हम दोनों ने
दो जिस्म इक जां
हो जाने के लिए मांगे थे
अब जब वो लम्हे
हमें नसीब हुए
तुम उनसे विमुख होने का सोच रही हो
अपनी ही आरज़ुओं का
अजन्मे ही गला घोंट रही हो
क्या तुम इस सोच के अपराध बोध से
स्वयं को मुक्त कर पाओगी
क्या मात्र
दुनियावी आरोपों से घबराकर
तुम रूहानी अहसासों से मुक्त हो जाओगी
शायद कभी नहीं
बहुत दर्द होगा जब
वक्त की नुकीली सुईयां
बीते लम्हों को कुरेदेंगी
हम, मैं और तुम में
विभक्त हो कर भी
विभक्त न हो पाएंगे
हमारी जिस्मानी विभक्ति
शायद दुनिया के लिए जीत हो जाए
पर हमारे रूहानी मिलन पर
वो पाबंदी न लगा पाएंगे //

अब तुम ही बताओ
क्या तुम्हारी इस सोच का
कोई औचित्य है ?

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on April 17, 2016 at 8:10pm

आदरणीय   Ram Ashery  जी प्रस्तुति को मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by Ram Ashery on April 17, 2016 at 2:46pm

आपने अपने विचारों को बहुत ही नजाकत से पेश किया है आपको बहुत बहुत बधाई स्व्वीकर हो 

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