For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मनस पृष्ठ मुझको पढ़ाती नहीं हो- ग़ज़ल

122 122 122 122

निगाहें भला क्यूँ मिलाते नहीं हो।
मनस पृष्ठ मुझको पढ़ाते नहीं हो।।

छिपाते हो तुम राज अपने जिया के।
बताओ मुझे क्यों बताते नहीं हो।।

हैं चेहरे पे क्यों ये उदासी की पर्तें।
भला नूर क्यूँ तुम दिखाते नहीं हो।।

सघन वेदना के जो घन हैं हृदय में।
भला फिर क्यूँ दरिया बहाते नहीं हो।।

मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है।
सिवा इसके तुम मुस्कुराते नहीं हो।।

है 'पंकज'का नाता अगर नीर ही से।
तो नैनों में काहें खिलाते नहीं हो।।

.
मौलिक एवम् अप्रकाशित

Views: 759

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 17, 2016 at 2:53pm
आदरणीय रामबली सर सादर आभार।
Comment by रामबली गुप्ता on March 17, 2016 at 6:18am
बेहतरीन प्रस्तुति आ.पंकज जी सादर बधाई स्वीकार करें
आ.रवि सर के सुझावों से सहमत हूँ
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 16, 2016 at 8:51pm
आदरणीय सतविंदर भाई बहुत बहुत धन्यवाद
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 16, 2016 at 8:51pm
आदरणीय राहुल डांगी सर सादर आभार
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 16, 2016 at 5:39pm
बहुत ख़ूब आदरणीय पंकज भाई।
Comment by Rahul Dangi Panchal on March 16, 2016 at 10:28am
आदरणीय ग़ज़ल अच्छी हुई है ।

मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है।
सिवा इसके तुम मुस्कुराते नहीं हो।।
बहुत सुन्दर
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 15, 2016 at 11:19pm
आदरणीय रवि सर सादर प्रणाम।
रचना को आशीर्वाद प्रदान करने के लिए हार्दिक आभार।

आपके सुझाव सर्वथा उपयुक्त हैं, इस संदर्भ में प्रयास अवश्य होगा।

उर्दू-हिंदी और हिंदी-उर्दू का "शर्बत" अक्सर इस लिए बन जाता है, क्योंकि मैं जौनपुर शहर में रहा हूँ, विशुद्ध ब्राह्मण परिवार में पला-बढ़ा लेकिन अटाला मस्ज़िद के आस पास किशोरावस्था बीती। संस्कृतियों के आपसी तालमेल नें न जाने कब हिंदी और उर्दू के शब्दों को स्व-के साथ(with the self) आबद्ध कर दिया कि मैं जान ही न सका। अब जब भी लिखता हूँ तो सच मानिये- किसी शब्द को जबरन नहीं बैठाता, जो जहाँ स्वतः आ गए उन्हें वहीँ लिख देता हूँ।

मैंने एक शेर लिखा था जिसे आदरणीय हरिनारायण हरीश जी, आदरणीय बुद्धिनाथ मिश्र जी के समक्ष मंच पर पढ़ा था, वही यहाँ लिख रहा हूँ-

2212 122 2212 122
"क्या कर रहे हो पंकज, क्यों कर मिला रहे हो।
अलगाव वाद वाले, सब क्रुद्ध हो रहर हैं।।"

★★★★★★★★★★★★★★★

यद्यपि मैं आगे से आपके सुझाव के अनुरूप विशुद्ध भाषाई अभिव्यक्ति के लिए प्रयास अवश्य करूँगा।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 15, 2016 at 10:53pm
आदरणीय मोहित मिश्रा जी सादर आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 15, 2016 at 10:53pm
आदरणीय तेजवीर सर आशीर्वाद प्रदान करने के लिए सादर प्रणाम
Comment by Ravi Shukla on March 15, 2016 at 12:42pm

आदरणय पंकज जी बधाई स्‍वीकार करें इस गजल के लिये । हमारी व्‍यक्ति गत सोच के अनुसार जब हिन्‍दी भाषा में आपके विचार इतने सुन्‍दर तरीके से व्‍यक्‍त हो रहे है तो इनके साथ दूसरी भाषा के शब्‍दों को घालमेल रस अनुभूति में बाधा उत्पन्न कर रहे हे इसी प्रकार उर्दू भाषा में कोई गजल हो तो उसमें हिंदी के शब्‍द यही प्रभाव पैदा करते है । भाषाई संस्‍कृति पर हमारी किसी से कोई कोई बहस नहीं है हम जानते और मानते है दोनो ही भाषाओ में इस विधा पर बहुत अच्‍छा काम हुआ है और हो रहा है यह श्‍ुाभ संकेत है ।

आपके मतले में प्रथम अक्षर ही निगाहे है और बाकी‍ मिसरा और सानी शुद्ध हिन्‍दी में

इसी तरह

सघन वेदना के जो घन हैं हृदय में कितना सुन्‍दर भाषाई सौन्‍दर्य है इस वाक्‍य मे और इसी शेर के सानी में दरिया शब्‍द इसी प्रकार रस में बाधक लगा हमें ।

आपसे और मंच से अपनी बात साझा की है ताकि शायद इस पर कुछ और चर्चा हो । आशा है आप अन्‍यथा नहीं लेंगे । हां आपकी गजल के बारे में तो पहले ही कह चुके है अच्‍छी गजल है पुन: बधाई । सादर

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Chetan Prakash replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"शुभ प्रभात,  आदरणीय! चौपाई छंद:  भेदभाव सच सदा न होता  वर्ग- भेद कभी सच न…"
1 minute ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"चौपाई छंद +++++++++ करे मरम्मत जूते चप्पल। काम नित्य का यही आजकल॥ कटे फटे सब को सीता है। सदा…"
7 minutes ago
Admin replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"स्वागतम"
11 hours ago
Admin posted discussions
11 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूसबिना कमीशन आजकल, कब होता है काम ।कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।।घास घूस…See More
Wednesday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . प्यार

दोहा सप्तक. . . . प्यारप्यार, प्यार से माँगता, केवल निश्छल प्यार ।आपस का विश्वास ही, इसका है आधार…See More
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, उत्साहवर्धन व स्नेह के लिए आभार।"
Sunday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
Sunday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ.लक्ष्मणसिह धानी, 'मुसाफिर' साहब  खूबसूरत विषयान्तर ग़ज़ल हुई  ! हार्दिक …"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर मुक्तक हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।"
Feb 15

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service