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ज़िंदा अभी तलक हैं, रावण दहेज़ वाले

2212 122 2212 122

दुःख सर पे चढ़ गया है, पीड़ा पिघल रही है।

हालात की तपिश से, नदिया निकल रही है।।

 

मरघट सा हो गया है, हर रास्ता शहर का।

इंसानियत चिता पर, हर ओर जल रही है।।

 

ज़िंदा अभी तलक हैं, रावण दहेज़ वाले।

अब भी दहेज़ वाली, क्यों सोच पल रही है।।

 

विद्रोह कर रही है, अब सोच भी हमारी।

क्यों मौन हूँ अभी तक, ये बात खल रही है।।

 

ग़र चे कलम के बदले, हथियार उठ गया तो।

पंकज से फिर न कहना, आदत बदल रही है।।

 

-----------------------------------------------

 

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 23, 2016 at 7:17pm
आदरणीय भाई सतविंदर जी सादर आभार। होली की शुभकामनाएं
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 23, 2016 at 7:01pm
विद्रोह कर रही है, अब सोच भी हमारी
क्यों मौन हूँ अभी तक, ये बात खल रही है...........वाह वाह बहुत ख़ूब

ग़र चे कलम के बदले, हथियार उठ गया तो
पंकज से फिर न कहना, आदत बदल रही है........बहुत तीक्ष्ण वविचार


हार्दिक बधाई आदरणीय पंकज भाई
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 23, 2016 at 6:46pm
आदरणीय गोपाल सर सादर आभार और नमन्
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 23, 2016 at 5:16pm

ग़र चे कलम के बदले, हथियार उठ गया तो।

पंकज से फिर न कहना, आदत बदल रही है।।-------सुभान अल्लाह. 

 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 21, 2016 at 9:14pm
आदरणीय rahila जी सादर आभार।
Comment by Rahila on March 21, 2016 at 9:13pm
ज़िंदा अभी तलक हैं, रावण दहेज़ वाले।
अब भी दहेज़ वाली, क्यों सोच पल रही है।। वाह. ..क्या शानदार शेर कहा आदरणीय सर जी! पूरी गज़ल ही उम्दा बन पड़ी । बहुत बधाई । सादर नमन

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