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लेन-देन की परम्परा [ अतुकांत कविता] /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

लेन-देन की परम्परा
नीचे से ऊपर तक
छोटों से बड़ों तक

ऊपरवाला भी अब करता
व्यवसाय सी प्रक्रिया
कभी देता, कभी लेता
हिसाब बराबर सब करता
संकेतों को कौन समझता?

इन्सान ही तो कर्ता-धर्ता
दूर-तंत्र से नचता
विकास संग विनाश का मेला
रंगीन, संगीन, ग़मगीन
कोई बदनाम, कोई नामचीन

गति, प्रगति, मति या अति में
यति करती स्वत: प्रकृति
सृष्टि की अजब नियति
अवसरवादिता की प्रखर
मानव जैसी चतुर
लेन-देन की परम्परा।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 6, 2016 at 7:56pm
रचना पर उपस्थित हो कर प्रोत्साहित करने के लिए हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी, आदरणीय समर कबीर साहब, मोहतरमा प्रतिभा पाण्डेय जी व मोहतरमा राहिला साहिबा।
Comment by pratibha pande on February 9, 2016 at 10:53pm
सुन्दर भाव व्यक्त किये हैं आपने इस अतुकांत में आदरणीय उस्मानी जी ,हार्दिक बधाई

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 9, 2016 at 8:18pm
आदरणीय उस्मानी जी बहुत बढ़िया भावाभिव्यक्ति। विषय प्रभावित करता है। हार्दिक बधार। सादर
Comment by Samar kabeer on February 9, 2016 at 2:32pm
जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,इस शानदार प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें !
Comment by Rahila on February 9, 2016 at 2:09pm
बहुत खूबसूरत प्रस्तुति आदरणीय उस्मानी जी!बहुत बधाई आपको । सादर
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 9, 2016 at 1:22pm
मेरी इस ब्लोग पोस्ट पर सम्मान्य उपस्थिति व सराहना करने के लिए हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय डॉ. विजय शंकर जी व आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी।
Comment by Shyam Narain Verma on February 9, 2016 at 12:57pm
बहुत ही सुंदर , हार्दिक बधाई । सादर
Comment by Dr. Vijai Shanker on February 9, 2016 at 10:57am
आदरणीय शेख शहजाद उस्मानी जी , इस नवीन प्रस्तुति के लिये बधाई , सुन्दर है,सादर।

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