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पोजीटिव टाइम (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

खिड़की से झांकते हुए बाहर का दृश्य आज पति-पत्नी दोनों को कुछ संतुष्टि दे रहा था। आज दोनों बच्चे स्वेच्छा से कुछ कर पा रहे थे।

" देखो, हम दोनों टीचर होते हुए भी बच्चों को कभी सकारात्मक समय नहीं देते ! उनको प्रकृति के समीप रहने दो, डांटना- फटकारना नहीं!"

"हां, सही कह रहे हैं आप! आज यहाँ पर उन्हें जानने दो कि कैसे पानी सींचते हैं? कैसे पलाश , गेंदे के फूल खिलकर यूँ झर जाते हैं! सूखे पत्तों का क्या हश्र होता है!"

"बांस कैसे पैदा होता है, ताड़ का पेड़ क्या होता है, यह भी जान लें"

"बंदर किस तरह प्यासे रह जाते हैं?... कैसे इन्सान जैसा व्यवहार करते हैं, और कैसे आत्मनिर्भर रहने वाले जीव अब इन्सान की मदद पर निर्भर हैं?

"हम नौकरी और घर-गृहस्थी में फंसे रहते हैं और हमारे बच्चे स्कूल, ट्यूशन, प्रोजेक्ट, असाइनमेन्ट या फिर क्रिकेट में, बस!"

"हाँ, बिलकुल सही कहा! हम तो सिर्फ उनके मार्क्स , प्रोग्रेस कार्ड देखकर ख़ुश हो लेते हैं!
प्रकृति और पर्यावरण का व्यवहारिक ज्ञान कहां मिल पाता उन्हें?"

"क़िताबी ज्ञान कितना बोझिल हो चुका है बच्चों पर!"

चर्चा करते हुए वे दोनों बच्चों के स्कूल बैग अगले दिन के लिए जमाने लगे।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 6, 2016 at 6:09pm
अपने विचारों को साझा करते हुए स्नेहिल प्रोत्साहन प्रदान करने के लिए हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद जनाब समर कबीर साहब,आदरणीय तस्दीक़ अहमद ख़ान साहब, आदरणीय हरि प्रकाश दुबे जी व आदरणीय सतविंदर कुमार जी
Comment by Hari Prakash Dubey on February 2, 2016 at 1:24am

बहुत बढ़िया , वाकई बच्चों को अभिभावक वांछित समय नहीं दे पाते है, बधाई आपको आ. शेख़ शहज़ाद उस्मानी साहब ! सादर 

Comment by Samar kabeer on February 1, 2016 at 11:01pm
जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,हमेशा की तरह ये लघुकथा भी दिल को छू गई,बहुत बधाई आपको !
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 1, 2016 at 9:05pm
हर बच्चे हर घर की कहानी।बेहद ही संजीदगी से उठाया आपने इस विषय को भी।बहुत बहुत बधाई आदरणीय शेख शहज़ाद जी।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on January 30, 2016 at 9:06pm

जनाब शेख शहज़ाद उस्मानी साहिब ,आपने लघु कथा में हर घर की हक़ीक़त बयां कर दी है। ... बेहतर प्रस्तुति के लिए मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं

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