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शिकन भरा लिबास....

शिकन भरा लिबास......

ये सुर्ख सी आँखें
बिखरी हुई जुल्फें
शिकन भरा लिबास देख
आज अपने ही दर्पण में
मैं लुटी नज़र आती हूँ //
हर शब की तरह
जो आज भी
इस जिस्म को रूहानी ज़ख़्म दे गया
फिर उसी के साथ बेवजह
जीने की ज़िद कर जाती हूँ //
जानती हूँ
वो फिर कुछ पल के लिए आएगा
अपने दिए ज़ख्मों पे
झूठे वादों का मरहम लगाएगा
मैं उसकी बातों में आजाऊंगी
भूल जाऊँगी दर्द ज़ख्मों का
और अपना अस्तित्व भी भूल जाऊँगी //
झूठा ही सही
फिर भी उस पल के लिए
उस खारे सागर की लहर बन
उसमें समा जाऊँगी //
फ़रेब ही सही
पर उस फ़रेब के लिए
मैं तमाम शब्
उसके इंतज़ार में सहर तलक 
इक चराग जलाऊँगी //
लूट जाऊँगी मगर
अपनी क़बा की शिकन
कभी न मिटाऊँगी//

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on January 8, 2016 at 12:36pm

आदरणीय उस्मानी साहिब प्रस्तुति पर आपकी आत्मीय सराहना का दिल से आभार। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 7, 2016 at 10:08pm

आदरणीय सुशील सरना भाई , बहुत सुन्दर !! एक और अच्छी कविता के लिये आपको हादिक बधाई ।

Comment by Sushil Sarna on January 7, 2016 at 7:16pm

आदरणीय उस्मानी साहिब प्रस्तुति पर आपकी आत्मीय सराहना का दिल से आभार। 

Comment by Sushil Sarna on January 7, 2016 at 7:16pm


आदरणीय समीर कबीर जी प्रस्तुति को इतना मान देने का हार्दिक आभार।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 7, 2016 at 7:02pm
प्रतीकों/बिम्बों से सच्चाई बयान करती प्रस्तुतिकेलिए हृदयतल से बहुत बहुत बधाई आपको जनाब सुशील सरना जी।
Comment by Samar kabeer on January 7, 2016 at 5:30pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत सुंदर,ख़ूबसूरत भाव वाह वाह बहुत आनन्द आया,बधाई स्वीकार करें |

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