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कुछ छन्नपकैया सारछन्द (एक प्रयास)

छन्न पकैया छन्न पकैया,ओ.बी.ओ है बहतर
सारी बातें हो जाती हैं,यहाँ अदब में रहकर

छन्न पकैया छन्न पकैया, प्रभू की है माया
आज हुवा जाता है देखो,अपना ख़ून पराया

छन्न पकैया छन्न पकैया ,मंहगी बहुत दवाई
बिन इलाज के मर गए देखो,अपने बाबू भाई

छन्न पकैया छन्न पकैया,बढ़ा लो सब नाख़ून
इस दुनिया में लागू होगा,जंगलों का क़ानून

छन्न पकैया छन्न पकैया,वाणी अच्छी बोली
जब भी अपने लब खोलो तो बोलो सच्ची बोली

छन्न पकैया छन्न पकैया ,ग़ज़लें कहते कहते
सार छन्द में डूब न जाऐ ,"कबीर" बहते बहते

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on December 24, 2015 at 4:58pm
जनाब मिथिलेश वामनकर जी आदाब,अब मैं पूरी बात समझ गया,आगे से ध्यान रखूंगा,मार्गदर्शन के लिये भू
बहुत बहुत धन्यवाद |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2015 at 2:51pm
आदरणीय समर कबीर जी, मैं सार छंद के चरणान्त के सम्बन्ध में निवेदन कर रहा था। पदों के किसी चरणान्त में तगण (ऽऽ।, २२१), रगण (ऽ।ऽ, २१२), जगण (।ऽ।, १२१) का निर्माण नहीं होना चाहिए। सादर
Comment by Samar kabeer on December 24, 2015 at 2:26pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी आदाब,"प्रभु"की मैं चार मात्रा गिन रहा था,इस कारण ये भूल हुई,आइन्दा ध्यान रखूँगा,एक बात ये कि "ईश्वर"या "इश्वर"क्योंकि ईश्वर मैं पांच मात्रा हैं या चार,पुनः मार्गदर्शन करें,एक बार फिर आपको धन्यवाद,स्नेह बनाए रखयेगा |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 24, 2015 at 12:18pm

आदरनीय समर भाई , प्रभु की मात्रा 2 होती है , इस लिहाज से पद मे , 

प्रभू की है माया   --  2 मात्रा कम है , अतः आप  इसे  -- ईश्वर की है माया --   किया जा सकता है ।

नाखून और कानून की  तुकांतता सही है , ब स अगर  व्यंजन भी लिल जाये तो उस तुकांतता को सबसे अच्छा माना जाता है , लेकिन ये गलत नही है । अगर मिथिलेश भाई जी का इशारा और कुछ है तो वही बता सकते हैं ।

Comment by Samar kabeer on December 24, 2015 at 11:54am
जनाब गिरिराज भंडारी जी आदाब , ये सब आपकी और जनाब सौरभ पांडे जी की हौसला अफ़ज़ाई का ही नतीजा है , और इसका श्रेय मैं आप दोनों को ही देना चाहूँगा , जनाब मिथिलेश जी की बात पूरी तरह मेरी समझ में नहीं आसकी उनसे पुनः समझाने का आग्रह किया है , आपसे भी निवेदन है कि इस बारे में कहाँ मुझसे त्रुटि हुई है मुझे ज़रूर बताएँ,रचना की सराहना , मार्गदर्शन के लिए आपका तहे दिल से धन्यवाद ।
Comment by Samar kabeer on December 24, 2015 at 11:45am
जनाब लक्ष्मण धामी जी आदाब,अन्यथा लेने की क्या बात है,अभी तो आप से बहुत कुछ सीखना है,रचना की सराहना के लिए दिल से धन्यवाद |
Comment by Samar kabeer on December 24, 2015 at 11:20am
जनाब मिथिलेश वामनकर जी आदाब,हौसला अफ़ज़ाई और मार्ग दर्शन के लिए दिल से शुक्रिया,"प्रभु"की मात्र दो हैं या तीन ?"नाखून"और "क़ानून"में तुकान्त ता नहीं है क्या,बराह_ए_करम तफ़सील से बताने का कष्ट करें ताकी आगे ग़लती न हो |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 24, 2015 at 11:14am

आदरणीय समर भाई , छंद रचना मे आपने बड़ा ही धमाकेदार प्रवेश किया है , सफल प्रथम प्रयास के लिये हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें । आदरणीय मिथिलेश भाई जी बातों का खयाल कीजियेगा ।

Comment by Samar kabeer on December 24, 2015 at 11:06am
बहना राजेश कुमारी जी आदाब,ये सब जनाब गिरिराज भंडारी जी और जनाब सौरभ पांडे जी की हौसला अफजाई का नतीजा है,छन्द आपको पसन्द आगये मेरा लिखना सार्थक हुआ,दिल से शुक्रिया,मार्गदर्शन अपेक्षित है|
Comment by Samar kabeer on December 24, 2015 at 10:55am
जनाब रवि शुक्ल जी आदाब,मेरी कोशिश आपको पसन्द आई लिखना सफल हुआ,हौसला अफ़ज़ाई का दिल से शुक्रिया मार्गदर्शन अपेक्षित है|

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