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ग़ज़ल- सारथी || दोस्त कोई न मेह्रबाँ कोई ||

दोस्त कोई न मेह्रबाँ  कोई 

काश मिल जाए राज़दाँ कोई  /१

दिल की हालत कुछ आज ऐसी है 

जैसे लूट जाए कारवाँ कोई  /२ 

एक ही बार इश्क़ होता है 

रोज होता नहीं जवाँ कोई  /३  

तुम को वो सल्तनत मुबारक हो 

जिसकी धरती न आसमाँ कोई   /४ 

सारथी कह सके जिसे अपना 

सारथी के सिवा कहाँ कोई /५ 

...........................................
सर्वथा मौलिक व अप्रकाशित

अरकान: २१२२ १२१२ २२ 

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Comment by Saarthi Baidyanath on December 17, 2015 at 2:00pm

आदरणीय  मिथिलेश वामनकर जी , आशीर्वाद है आपका ! कृपया स्नेह बनाये रखियेगा ! आपका ही - सारथी :)


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 16, 2015 at 11:56pm

आदरणीय बैजनाथ जी इस सुन्दर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई 

Comment by Saarthi Baidyanath on December 16, 2015 at 3:35pm


"जैसे लूट जाए कारवाँ कोई" , जी जनाब समर कबीर साहिब , लिखने में गलती हुई , कृपया सही करके पढ़ा जाए , प्रार्थी  !

Comment by Saarthi Baidyanath on December 16, 2015 at 3:34pm

आदरणीय  laxman dhami जी , अनेक धन्यवाद ! सादर नमन सहित :)

Comment by Saarthi Baidyanath on December 16, 2015 at 3:33pm

भाई  jaan' gorakhpuri जी और जनाब  Samar kabeer साहिब , आपकी दुआओं और मुहब्बतों के लिए तहे-दिल से शुक्रगुजार हूँ ! मोहतरम कबीर साहिब , आपने ख़ाकसार को जो इज्जत बख्शी है , उसके लिए शीश नत प्रणाम कर रहा हूँ और हृदय-तल से आभार भी ज्ञापित कर रहा हूँ !

विनीत आभार सहित , आपका ही सारथी :)

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 16, 2015 at 11:22am

इस अच्छी ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई l

Comment by Samar kabeer on December 15, 2015 at 10:52pm
मुआफ़ी चाहता हूँ,आपने ग़ज़ल के अरकान नीचे लिखे हैं इसलिये देख नहीं पाया ।
Comment by Samar kabeer on December 15, 2015 at 10:50pm
जनाब बैधनाथ सारथी जी,आदाब,ओबीओ पर पहली बार आपकी ग़ज़ल से रूबरू हुवा हूँ,अच्छा कहते हैं आप,आपकी ग़ज़ल सुनकर दिल बाग़ बाग़ हुवा,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।

"जैसे लूट जाए कारवाँ कोई"

इस मिसरे में शायद टंकण त्रुटि से 'लुट' की जगह "लूट" हो गया है,देख लीजियेगा ,हाँ एक बात और कि आपने ग़ज़ल के अरकान नहीं लिखें हैं ।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on December 15, 2015 at 2:53pm
ओबीओ पर मैं आपकी पहली रचना देख रहा हूँ आ.भाई बैद्यनाथ जी..बहुत ख़ुशी हुयी आपकी यहाँ पाकर..अच्छी गजल हुयी है हार्दिक बधाई।

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