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ज़िंदगी का रंग फीका था मगर इतना न था

ज़िंदगी का रंग फीका था मगर इतना न था

इश्क़ में पहले भी उलझा था मगर इतना न था

 

क्या पता था लौटकर वापस नहीं आएगा वो

इससे पहले भी तो रूठा था मगर इतना न था

 

दिन में दिन को रात कहने का सलीका देखिये

आदमी पहले भी झूठा था मगर इतना न था

 

अब तो मुश्किल हो गया दीदार भी करना तिरा

पहले भी मिलने पे पहरा था मगर इतना न था

 

उसकी यादों के सहारे कट रही है ज़िंदगी

भीड़ में पहले भी तन्हा था मगर इतना न था

 

टुकड़ा टुकड़ा हो गया है ज़िंदगी का आईना

इससे पहले भी मैं टूटा था मगर इतना न था

 

उसके जाने से बढ़ी 'सूरज' मेरी तिष्नालबी

प्यार के दरिया में प्यासा था मगर इतना न था

 

डॉ सूर्या बाली 'सूरज'

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by LOON KARAN CHHAJER on January 8, 2016 at 5:59pm

दिन में दिन को रात कहने का सलीका देखिये

आदमी पहले भी झूठा था मगर इतना न था

 बहुत अच्छी गजल के लिए साधुवाद।

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on December 9, 2015 at 11:34pm

आदरणीय नीता जी , आशुतोष जी, प्रदीप जी, गणेश जी , कांति जी और लक्ष्मण जी हौसला अफजाई के लिए आप सभी का हृदय से आभार !

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 5, 2015 at 10:01pm

हुत खुबसूरत गजल कही है.बहुत मुबारकबाद कुबुलें आ .भाई सूरज बाली जी.

Comment by kanta roy on December 4, 2015 at 5:34pm

दिन में दिन को रात कहने का सलीका देखिये
आदमी पहले भी झूठा था मगर इतना न था----वाह !!! हर अशआर लाज़वाब बने है। बेहतरीन ग़ज़ल हुई है ये आपकी आदरणीय डॉ. सूर्या बाली "सूरज" जी। बधाई कबूल करे।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 1, 2015 at 3:56pm

आदरणीय डॉ सूरज बाली जी, सभी अशआर पसंद आये, अच्छी ग़ज़ल प्रस्तुत हुई है, बहुत बहुत बधाई.

Comment by प्रदीप नील वसिष्ठ on November 29, 2015 at 5:34pm

आपकी इस रचना ने मरहूम जगजीत जी द्वारा गाई ग़ज़ल याद दिला दी।  शुक्रिया 

तेरे बारे में जब सोचा नहीं था 

मैं तन्हा था मगर इतना न था 

Comment by Ashutosh kumar on November 29, 2015 at 11:42am

सुन्दर भाव मगर कुछ शब्द कहीं कहीं इसे लयबद्ध करने में बाधा डालते हैं. एक अच्छी ग़ज़ल की पहली पहचान है की इसे आसानी से गुनगुनाया जाये.

Comment by Nita Kasar on November 25, 2015 at 9:10pm
निहायत ही बेहद खूबसूरत ग़ज़ल हुई है बधाई आद० सूर्या बाली सूरज जी ।
Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on November 21, 2015 at 11:46am

वो बी वो परिवार के सभी सदस्यों को सादर नमस्कार। कुछ व्यस्तताओं के कारण आपके बीच आ पाना संभव नहीं हो पाया। लगभग एक साल के अंतराल के बाद भी आप का प्यार वैसे ही बरकरार है॥  भाई मिथिलेश बामनकर, रवि शुक्ला जी , गिरिराज भण्डारी जी, सौरभ पांडे जी, शुशील शर्मा जी, धर्मेंद्र कुमार सिंह जी , महेंद्र कुमार जी, अशोक रकताले जी, सतविंदर जी और दिनेश कुमार जी आप सभी हृदय से विशेष रूप से आभार और धन्यवाद । 

Comment by दिनेश कुमार on November 19, 2015 at 4:49am
बेहतरीन ग़ज़ल। आदरणीय सूरज साहब। waaah वाअह।

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