For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ज़िंदगी का रंग फीका था मगर इतना न था

ज़िंदगी का रंग फीका था मगर इतना न था

इश्क़ में पहले भी उलझा था मगर इतना न था

 

क्या पता था लौटकर वापस नहीं आएगा वो

इससे पहले भी तो रूठा था मगर इतना न था

 

दिन में दिन को रात कहने का सलीका देखिये

आदमी पहले भी झूठा था मगर इतना न था

 

अब तो मुश्किल हो गया दीदार भी करना तिरा

पहले भी मिलने पे पहरा था मगर इतना न था

 

उसकी यादों के सहारे कट रही है ज़िंदगी

भीड़ में पहले भी तन्हा था मगर इतना न था

 

टुकड़ा टुकड़ा हो गया है ज़िंदगी का आईना

इससे पहले भी मैं टूटा था मगर इतना न था

 

उसके जाने से बढ़ी 'सूरज' मेरी तिष्नालबी

प्यार के दरिया में प्यासा था मगर इतना न था

 

डॉ सूर्या बाली 'सूरज'

(मौलिक और अप्रकाशित)

Views: 954

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by LOON KARAN CHHAJER on January 8, 2016 at 5:59pm

दिन में दिन को रात कहने का सलीका देखिये

आदमी पहले भी झूठा था मगर इतना न था

 बहुत अच्छी गजल के लिए साधुवाद।

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on December 9, 2015 at 11:34pm

आदरणीय नीता जी , आशुतोष जी, प्रदीप जी, गणेश जी , कांति जी और लक्ष्मण जी हौसला अफजाई के लिए आप सभी का हृदय से आभार !

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 5, 2015 at 10:01pm

हुत खुबसूरत गजल कही है.बहुत मुबारकबाद कुबुलें आ .भाई सूरज बाली जी.

Comment by kanta roy on December 4, 2015 at 5:34pm

दिन में दिन को रात कहने का सलीका देखिये
आदमी पहले भी झूठा था मगर इतना न था----वाह !!! हर अशआर लाज़वाब बने है। बेहतरीन ग़ज़ल हुई है ये आपकी आदरणीय डॉ. सूर्या बाली "सूरज" जी। बधाई कबूल करे।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 1, 2015 at 3:56pm

आदरणीय डॉ सूरज बाली जी, सभी अशआर पसंद आये, अच्छी ग़ज़ल प्रस्तुत हुई है, बहुत बहुत बधाई.

Comment by प्रदीप नील वसिष्ठ on November 29, 2015 at 5:34pm

आपकी इस रचना ने मरहूम जगजीत जी द्वारा गाई ग़ज़ल याद दिला दी।  शुक्रिया 

तेरे बारे में जब सोचा नहीं था 

मैं तन्हा था मगर इतना न था 

Comment by Ashutosh kumar on November 29, 2015 at 11:42am

सुन्दर भाव मगर कुछ शब्द कहीं कहीं इसे लयबद्ध करने में बाधा डालते हैं. एक अच्छी ग़ज़ल की पहली पहचान है की इसे आसानी से गुनगुनाया जाये.

Comment by Nita Kasar on November 25, 2015 at 9:10pm
निहायत ही बेहद खूबसूरत ग़ज़ल हुई है बधाई आद० सूर्या बाली सूरज जी ।
Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on November 21, 2015 at 11:46am

वो बी वो परिवार के सभी सदस्यों को सादर नमस्कार। कुछ व्यस्तताओं के कारण आपके बीच आ पाना संभव नहीं हो पाया। लगभग एक साल के अंतराल के बाद भी आप का प्यार वैसे ही बरकरार है॥  भाई मिथिलेश बामनकर, रवि शुक्ला जी , गिरिराज भण्डारी जी, सौरभ पांडे जी, शुशील शर्मा जी, धर्मेंद्र कुमार सिंह जी , महेंद्र कुमार जी, अशोक रकताले जी, सतविंदर जी और दिनेश कुमार जी आप सभी हृदय से विशेष रूप से आभार और धन्यवाद । 

Comment by दिनेश कुमार on November 19, 2015 at 4:49am
बेहतरीन ग़ज़ल। आदरणीय सूरज साहब। waaah वाअह।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर परदोहा एकादश   . . . . पतंगआवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग । बीच पतंगों के…See More
yesterday
Admin posted discussions
Tuesday
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175

 आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey posted a blog post

नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ

   जिस-जिस की सामर्थ्य रही है धौंस उसी की एक सदा से  एक कहावत रही चलन में भैंस उसीकी जिसकी लाठी…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आपने कहे को सस्वर किया इस हेतु धन्यवाद, आदरणीय  //*फिर को क्यों करने से "क्यों "…"
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना को आपने अनुमोदित कर मेरा उत्साहवर्धन किया, आदरणीय विजत निकोर जी हार्दिक आभार .. "
Tuesday
Sushil Sarna commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"आदरणीय जी सादर प्रणाम -  अद्भुत सृजन - हृदय तटों को छूती गहन भावों की अभिव्यक्ति ने अहसासों की…"
Tuesday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"प्रिय अशोक कुमार जी,रचना को मान देने के लिए हार्दिक आभार। -- विजय"
Monday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सौरभ जी। आपने सही कहा.. मेरा यहाँ आना कठिन हो गया था।       …"
Monday
vijay nikore commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"प्रिय सौरभ भाई, नमस्ते।आपका यह नवगीत अनोल्हा है। कई बार पढ़ा, निहित भावना को मन में गहरे उतारा।…"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service