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कैसे अपने मधु पलों को .... (१००वी रचना )

कैसे अपने मधु पलों को शूल शैय्या पे छोड़   आऊँ
स्मृति घटों पर विरहपाश के कैसे बंधन तोड़ आऊं

विगत पलों के अवगुंठन में
इक दीप अधूरा जलता रहा
अधरों पर   लज्जा शेष रही
नैनों में स्वप्न मचलता रहा

एकांत पलों में तृप्ति भाव को किस आँगन मैं छोड़ आऊँ
प्रिय स्मृति घटों पर विरहपाश के कैसे बंधन तोड़ आऊँ

अधरों से मिलना अधरों का
तिमिर का मौन शृंगार हुआ
तृषित देह का देह मिलन से
अंगार पलों  का संचार हुआ

किस पल को मैं बना के जुगनू तिमिर देश में छोड़ आऊँ
प्रिय  स्मृति घटों पर विरहपाश के कैसे बंधन तोड़ आऊँ

वज्र क्षणों की मृदु रज कण से
अलंकृत सुधियों की श्वास हुई
अभिषेक पीर का हुआ नीर से
कम्पित उर की  हर आस हुई

लोचन के मैं अश्रु कलश को किस मेघ देश में छोड़ आऊँ
प्रिय स्मृति घटों पर विरहपाश के कैसे बंधन  तोड़ आऊँ

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 7, 2015 at 10:07pm

आदरणीय सुशिल सरना जी 

शतकीय ब्लॉग प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई

विरह शृंगार का सुन्दर भावपूर्ण निरूपण हुआ है...जो कलात्मक है.

१६-१७ की यति पर गीत शिल्प का निर्वाह किया गया है, यद्यपि १६-१६ की पंक्तियाँ के साथ गीत में प्रवाह व गेयता अप्रतिम रहते हैं. 

इस भावप्रवण प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

Comment by Sushil Sarna on November 6, 2015 at 6:26pm

आदरणीय प्रतिभा जी रचना पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का हृदयतल की गहराईयों से हार्दिक आभार। आप सब के  स्नेह और मार्गदर्शन ने मुझे आज शतक छूने का सम्मान दिया है। हार्दिक हार्दिक आभार। 

Comment by pratibha pande on November 6, 2015 at 5:48pm

 इस भाव पूर्ण रचना के लिए ढेरों बधाई आदरणीय सुशील सरना जी  साथ  ही शतक के लिए भी हार्दिक बधाई 

Comment by Sushil Sarna on November 5, 2015 at 8:42pm

आ०   सतविंदर कुमार  जी रचना की प्रस्तुति पर आपकी आत्मीय  प्रशंसा  का दिल से आभार। 

Comment by Sushil Sarna on November 5, 2015 at 8:42pm

आ०   rajesh kumari जी रचना की प्रस्तुति पर आपकी आत्मीय  प्रशंसा  का दिल से आभार। 

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 5, 2015 at 8:09pm
बेहद उम्दा रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 5, 2015 at 7:52pm

आ० सुशील सरना जी ,बहुत भावपूर्ण गीत हुआ इसके  लिए तथा आपके शतक के लिए दिल से बहुत- बहुत बधाई |

Comment by Sushil Sarna on November 5, 2015 at 6:06pm

आदरणीय  Abid ali mansoor जी रचना की प्रस्तुति पर आपकी आत्मीय  प्रशंसा  का दिल से आभार। 

Comment by Abid ali mansoori on November 5, 2015 at 4:32pm

मन की अथाह गहराई में उतरती रचना, हार्दिक वधाई आदरणीय सुशील जी!

Comment by Sushil Sarna on November 5, 2015 at 2:35pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी रचना ने आपको प्रभावित किया ,मेरे लिए गर्व की बात है। आपकी हृदयग्राही प्रशंसा एवं गेयता बाबत सुझाव का दिल से हार्दिक आभार। 

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