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बुनियाद (लघुकथा) - मिथिलेश वामनकर [अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस पर ]

“आज फ्रेंडशिप डे है मगर ये डिसिप्लिन साला!....... सेलिब्रेट भी नहीं कर सकते.”

“आर्मी लाइफ है ब्रदर.”

“सुना, अमेरिका में ईराक पर हमले का अमेरिकी सैनिकों के साथ-साथ सिविलियन भी विरोध कर रहे है.”

“हाँ यार...... इतने पावरफुल देश की सेना में डिसिप्लिन ही नहीं है क्या?”

“अच्छा.... अगर इन्डियन आर्मी पाकिस्तान पर हमला करें तो क्या यहाँ भी विरोध होगा?”

“ अबे गद्दारों जैसी बात मत कर.......हमारा देश, राष्ट्रभक्तों का देश हैं. इसकी बुनियाद में ही......”

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by TEJ VEER SINGH on July 30, 2015 at 6:10pm

आदरणीय मिथिलेश जी, लघुकथा की बारीकियां तो नहीं समझता ,पर मुझे लघुकथा रोचक और मनभावन लगी!बधाई!

Comment by Neelima Sharma Nivia on July 30, 2015 at 4:33pm

सामयिक  विषय  पर ना जाने कुछ अधूरापन  सा लग रहा 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 30, 2015 at 1:39pm

आदरणीय सुशील सरना सर, आपको लघुकथा पसंद आई, लिखना सार्थक हो गया. सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार.

Comment by Sushil Sarna on July 30, 2015 at 1:31pm

वाह बहुत ही सार्थक लघु कथा प्रस्तुत की है आदरणीय मिथिलेश जी और ये पंक्ति 'अबे गद्दारों जैसी बात मत कर.......हमारा देश, राष्ट्रभक्तों का देश हैं. इसकी बुनियाद में ही..........”कुछ सोचने को मज़बूर करती है।  हार्दिक बधाई। 

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