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लोकतातंत्र तो दफ़न हो गया संसद की दीवारों में

कुछ तो बात अवश्य मित्र है संसद के गलियारों में।
वर्ना देश नहीं रह जाता अब तक यूँ अँधियारों में।।

उसको ही भाया है जनता सदा रहे दुःख से विह्वल।
जिसको भी सौंपी सत्ता जो पहुँचा उस चौबारे में।।

बड़ी बड़ी बातें जो अब तक घूम घूम कर करते थे।
उनका भी मन रमने लगा है परदेशी सत्कारों में।।

भले चिताएँ जलें सैकड़ों जनता की चौराहों पर।
चाहे जैसे रहे किन्तु हो राजमहल उजियारे में।।

जी करता है फूँक फ़ाँक दूँ काली पुस्तक अंधी देवी।
जब मज़ाक उड़ता है उनका संसदीय त्यौहारों में।।

मेरी आस्था बहुत अधिक है प्रीत बहुत है संविधान से।
किन्तु मृत्यु को प्राप्त हुआ वो अगणित अत्याचारों से।।

कोई माने या ना माने पर मैं बात खरी कहता।
लोकतंत्र तो दफ़न हो गया संसद की दीवारों में।।
============================
मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 27, 2015 at 5:36pm
आदरणीय समीर कबीर सर;अभी मैं ग़ज़ल के शिल्प पक्ष को सीख नहीं पाये हूँ;बहुत जल्द ही उन दोषों को भी दूर कर लूँगा। आपके सुझाव सर आँखों पर। मुझे ऐसे ही निर्देशित करते रहेंगे तो मैं आपका कृतज्ञ रहूँगा।।

तारीफ़ और उत्साहवर्धन के लिए दिल से धन्यवाद।।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 27, 2015 at 5:32pm
आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी और समदारणीय गिरिराज भंडारी सर आप दोनों लोगों को मेरा उत्साह वर्धन करनें के लिए हार्दिक आभार।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 27, 2015 at 4:15pm

आदरणीय पंकज जी इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 27, 2015 at 12:46pm

आदरनीय पंकज भाई , आपकी विचारोत्तेजक रचना के लिये आपको हार्द्क बधाइयाँ ॥

Comment by Samar kabeer on July 27, 2015 at 11:27am
जनाब पंकज कुमार मिश्रा जी,आदाब,ग़ज़ल आपने अच्छी कही है लेकिन उसके अरकान नहीं लिखे,इस कारण से ग़ज़ल को समझने में दुश्वारी हो रही है,आपकी ग़ज़ल के कई मिसरे बह्र में नहीं लगते,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 26, 2015 at 7:18pm

उत्साहवर्धन के लिये सादर आभार आदरणीय विजय शंकर जी और महर्षि त्रिपाठी जी

Comment by maharshi tripathi on July 26, 2015 at 6:27pm

आधुनिक लोकतंत्र की दशा पर प्रकाश डालती अच्छी रचना पर  आपको बधाई आ. Pankaj Kumar Mishra जी |

Comment by Dr. Vijai Shanker on July 26, 2015 at 6:24pm
लोकतंत्र कहाँ है , चुनावतंत्र है, जो चुना जाए वह अपने अपने तंत्र के अनुसार चलता है , लोकतंत्र की इतनी परिभाषाएं शायद ही कहीं मिलें।
आपको इस प्रस्तुति पर बधाई, आदरणीय पंकज कुमार मिश्रा जी, सादर।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 26, 2015 at 5:58pm
अहसास है आभास है
सब आक विश्वास है।।


धन्यवाद मनोज जी
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 26, 2015 at 5:56pm
अहसास है आभास है।
बस आपका विश्वास है।।

धन्यवाद मनोज जी

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