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मेरी बेटी( तीसरी कविता)___मनोज कुमार अहसास

आज दोपहरी जब कमरे पर
पहुँचा थका थकाया सा
सबसे पहले पहुँच गया था
वहाँ कोई भी अभी नहीं था
चला के पँखा लेट रहा था
चीं चीं की आवाज़ सुनी तो
बाहर जाकर देखा मैंने
दो चिड़ियाएँ फुदक रही है
चीं चीं चीं चीं
पास गया तो उड़ जाती थी
फुदक फुदक फिर आ जाती थी
पहले कभी नहीं देखा था
आज यें पहली बार मिली है
याद तुम्हारी दिला रहीं है
मेरी बिटिया
चिड़िया सी बिटिया
तेरी बोली इन चिड़ियों में मिल सी गयी है
घुल सी गयी है
इनके आजाने पर तो
ये कमरा घर सा लगता है
जैसे तुम दोनों टहल रही हो
फुदक रही हो चीख रही हो
जैसे उड़ना सीख रही हो
अम्बर सीना तान खड़ा है
धरती पर आराम बड़ा है
दूर गगन में स्वप्न के मेले
भीड़ जुटाए हुए खड़े है
गहरा सपना पाना है तो
बहुत ऊँचाई उड़ना होगा
तुझको खुद से लड़ना होगा
लेकिन गगन में उड़ने पर भी
आपनी चीं चीं खो ना देना
घोर सफलता के आँगन में
मन की सरलता खो जाती है
स्वप्न तो मिल जाते है लेकिन
दृष्टि कड़वी हो जाती है
बहुत उचाई उड़ने पर भी
निम्न नहीं किसी को मानो
जग में एक से एक बड़ा है
धीरे धीरे सब पहचानो
मेरी बिटिया
चिड़िया सी बिटिया
फुदक फुदक कर उड़ना सीखो
चीं चीं चीं चीं
करते जाओ


मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by narendrasinh chauhan on June 17, 2015 at 5:28pm

सुन्दर सार्थक रचना  ने लिये आपको बधाई

Comment by Shyam Narain Verma on June 17, 2015 at 4:44pm
सुन्दर सार्थक रचना  ने लिये आपको बधाई ….
Comment by मनोज अहसास on June 17, 2015 at 1:47pm
आ0 राजेश कुमारी जी कविता से जुड़ने के लिए बहुत आभार
आपने इन भावों को समझा और कविता कहा
इसके लिए आभार
आपका निर्देशन और आशीर्वाद सदैव बना रहे
सादर
Comment by मनोज अहसास on June 17, 2015 at 1:43pm
बहुत आभार आदरणीय मिश्रा जी
सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 17, 2015 at 12:54pm

आपकी कविता भी बेटियों की तरह मासूम होती हैं दिल से निकले भाव हमेशा दिल तक पँहुचते हैं ..बहुत अच्छी कविता ,बधाई आपको 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 17, 2015 at 8:45am

बहुत सुन्दर भाई मनोज जी० हार्दिक बधाई!

Comment by मनोज अहसास on June 16, 2015 at 11:18pm
नमस्कार कबीर सर
बहुत आभार
आपका प्रोत्साहन मेरा आधार बन जाता है
बहुत शुक्रिया
सादर
Comment by Samar kabeer on June 16, 2015 at 11:06pm
जनाब मनोज कुमार अहसास जी,आदाब,बेटी उन्वान से ये आपकी तीसरी कविता है,बेटी के प्रेम में लिप्त ये कविता भी बहुत सुन्दर है,हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by मनोज अहसास on June 16, 2015 at 9:58pm
नमस्कार सर
बेटियों से दूर परदेश में हर वक़्त कुछ न कुछ दिमाग में चलता रहता है
चाहे ये साहित्यिक स्तर पर कुछ भी हो
आप सदैव मेरा बहुत साहस बढ़ाते है
मुझे हमेशा एक वरिष्ठ आत्मीय का हाथ अपने सर पर महसूस होता है
सादर
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 16, 2015 at 9:12pm

बेटी के प्रति आपका प्यार स्पृहणीय  है . सादर .

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