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रातभर(गजल,मनन कु.सिंह)

गजल
2 2 2 2 2 2 1 21 2
बरसी है कल बरसात रातभर,
तरसा है पल कल रात रातभर।
धरती है अब तक भींग भींग कर,
तड़पा है मन कल रात रातभर।
पड़ती थीं बूँदें रात-गात पर,
बढ़ती थीं बातें रात रातभर।
झोंके थे पावन वात वान-से,
लहरी थी लगती रात रातभर।
तेरी थीं यादें रात घाव-सी,
मुझको थी लगती घात रातभर।
@मनन
वात=हवा
वान=युक्त
घात=चोट/घाव
गात=शरीर/देह

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Comment by Rahul Dangi Panchal on June 14, 2015 at 10:25pm
आदरणीय आपका भाव बहुत सुन्दर है
उसके लिए आपको बधाई हो
परन्तु मेरी समझ से आपकी बहर मान्य नहीं यह स्वयं निर्मित है और गजल तकाबुले रदीफ का भी दोष है आगे गुनीजन आपका मार्गदर्शन करेंगे!

आप एक बार गजल की कक्षा को पढे सादर विन्रम!

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