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मुतदारिक मुसम्मन सालिम 

212   212   212   212

आपकी  थी  हमें  भी  बहुत  कामना

आज   संयोग   से  हो गया सामना

 

आँख से आँख अपनी मिली इस तरह

रस्म भर  ही रहा  हाथ  का थामना

 

मयकशीं  जो  करूं तो  नशा यूँ चढ़े

और  आये  कभी  हाथ में जाम ना

 

इश्क आँखों  में जब से लगा नाचने

हो  गयी  पूर्ण   सारी  मनोकामना

 

हाथ में  हाथ  ले  बात की थी कभी

याद है वह  सुहानी तुम्हें  शाम ना

 

इश्क की मय हुयी है  मयस्सर जिसे

वह  नशेड़ी  रहा  आदमी  आम ना

 

जब तलक हम जहाँ से नही जायेंगे

तब तलक  है कहाँ  कोई आराम ना 

 

 

 (मौलिक व् अप्रकाशित )

 

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 8, 2015 at 4:29pm

आ० अनुज

आपकी इस्लाह बहुत जरूरी है . सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 8, 2015 at 4:28pm

सरना जी

आपका आभार . बात लय  के अधूरे पन की नहीं बल्कि काफिये के तंगी  की है  आमना, सामना, थामना. मनोकामना के बाद काफिया ही नहीं है सो शब्द जोड़कर काफिया बनाने  से लय  कुछ जरूर बाधित हुयी  गजल में काफिये का ध्यान रखना पडेगा .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 8, 2015 at 4:23pm

आ० वीनस जी

आपको ही पढ़कर लिखने का प्रयास कर रहा हूँ . सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 8, 2015 at 4:22pm

आ० अनुज

आपका मशवरा बहुत सही है . मैं एडिट करता हूँ . सादर .

Comment by Samar kabeer on June 8, 2015 at 2:57pm
आली जनाब डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी,आदाब,इस सुन्दर और शानदार ग़ज़ल के लिये शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।
Comment by narendrasinh chauhan on June 8, 2015 at 12:03pm

जब तलक हम जहाँ से नही जायेंगे

तब तलक  है कहाँ  कोई आराम ना, बहोत खूब ,सर , वैसे भी किस जीव की तृष्णा कब मिटती


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 8, 2015 at 10:32am

आदरणीय बड़े भाई , क्या बात है , अब सब ठीक है ! पुनः बधाई आपको ।

Comment by Sushil Sarna on June 6, 2015 at 2:27pm

आँख से आँख अपनी मिली इस तरह
रस्म भर ही रहा हाथ का थामना

क्या बात है सर क्या मिसरे उठाये हैं … गहन भावों से युक्त इस ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय डॉ गोपाल भाई साहिब। पता नहीं कहीं कहीं गेयता में कमी लगी जैसे ''और आये कभी हाथ में जाम ना''(कुछ अधूरी सी लय ) कृपया अन्यथा न लेवें ये मेरा दृष्टिकोण है हो सकता है मैं गलत होऊं। अनुज समझ के क्षमा करना। उत्तम भावों की इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by वीनस केसरी on June 6, 2015 at 2:09pm

आँख से आँख अपनी मिली इस तरह

रस्म भर  ही रहा  हाथ  का थामना

 

इस शेर ने तो लूट लिया ... वाह वा
एक छोटी सी कमी की ओर गिरिराज जी ने इंगित कर ही दिया है /.....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 6, 2015 at 1:57pm

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , क्या खूब गज़ल कही है , लाजवाब ! दिली बधाइयाँ स्वीकार करें । कुछेक अशआर  मे तकाबुले रदीफ दोष दिख रहा है -- 3,4,5,7, आप सक्षम हैं , मुझे विश्वास है आप सुधार लेंगे ॥ 

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