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वफ़ाओं का अपनी सिला चाहता हूँ

फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन

वफ़ाओं का अपनी सिला चाहता हूँ
ख़रीदो मुझे मैं बिका चाहता हूँ

मिरी ज़िन्दगी तो हुई ख़त्म,बेटे
मैं तेरे लिये सोचना चाहता हूँ

मुझे रोक लेती हैं मासूम कलियाँ
मैं ख़ुद से अगर भागना चाहता हूँ

मुझे उनकी ख़ुश्बू से महकाए रखना
मैं क्या तुझ से बाद-ए-सबा चाहता हूँ

लगाते हो क्यूँ दैर-ओ-मस्जिद प ताले
ख़ुदा का हर इक घर खुला चाहता हूँ

छियालीस डिग्री से ऊपर है गर्मी
मैं सावन की ठंडी हवा चाहता हूँ

"समर" अब ये क़िस्सा यहीं ख़त्म कर दो
सिफ़ारिश मैं तुम से किया चाहता हूँ

"समर कबीर"
मौलिक /अप्रकाशित

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 1, 2015 at 2:22pm

आदरणीय समर कबीर जी ...इस शानदार ग़ज़ल के हर शेर के लिए तहे दिल बधाई ...आदरणीय सौरभ सर की प्रतिक्रिया से रचना को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिली ..ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 1, 2015 at 11:55am

आदरणीय

मिरी ज़िन्दगी तो हुई ख़त्म,बेटे
मैं तेरे लिये सोचना चाहता हूँ----------------बाखुदा क्या गजल है . जादू-ए-कलम

Comment by वीनस केसरी on May 31, 2015 at 12:26pm

जब इतनी मशहूर ज़मीन हो तो शेर भी ऐसे बेमिसाल होने चाहिए ...
वाह वा
कामयाब ग़ज़ल के लिए ढेरो दाद क़ुबूल करें ...

Comment by Samar kabeer on May 31, 2015 at 10:39am
जनाब श्री सुनील जी,आदाब,ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by shree suneel on May 31, 2015 at 2:30am
मुझे रोक लेती हैं मासूम कलियाँ
मैं ख़ुद से अगर भागना चाहता हूँ"... उम्दा शे'र
आदरणीय समर कबीर सर, एक से बढ़कर एक, ख़ूबसूरत ग़ज़लें हैं आपके पास. इस ग़ज़ल के लिए भी दिल बधाईयाँ आपको.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 30, 2015 at 11:04pm

आदरणीय समर साहब, अभी-अभी थोड़ी देर लघुकथा पर चल रहे आयोजन में एक जगह मैंने जो निवेदन किया है, उसे आपके माध्यम से पुनः कहना चाहता हूँ.

मैं सर्वोपरि पाठक हूँ. एक निर्मम पाठक. ’वाह-वाह’ के लेमनचूस लुटा कर रचनाकारों की रचनाधर्मिता से खिलवाड़ नहीं कर सकता. यह दायित्वबोध ही रचनाओं के नीर-क्षीर का संबल देता है. यही पाठकत्व किसी रचनाकर्म के लिए आवश्यक विन्दु भी उपलब्ध कराता है. मेरा सदा से मानना रहा है, यदि रचनाकारों के अन्दर का पाठक संवेदनशील और सुग्राही नहीं है तो रचनाकारों के कर्म को सदा असंयत होने खतरा बना रहेगा. दूसरे, यदि अपने अन्दर का पाठक सचेत और जागरुक है तो वह अन्य रचनाकारों की सुगढ़ रचनाओं का दिल खोल कर स्वागत करेगा. मैं बस अपने पाठक को जिलाये रखना चाहता हूँ, आदरणीय.
सादर

Comment by Samar kabeer on May 30, 2015 at 10:53pm
जनाब मिथिलेश वामनकर जी,आदाब,

"तलब करना अबस है दाद का बज़्म-ए-सुख़नदाँ में
जो अच्छा शैर होता है सुख़नवर बोल उठते हैं"

सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ,ऐसे ही मेरी ग़ज़लों में शिर्कत कर के मेरा हौसला बढ़ाते रहें,धन्यवाद ।
Comment by Samar kabeer on May 30, 2015 at 10:45pm
आली जनाब सौरभ पांडे जी,आदाब,किसी ने क्या ख़ूब कहा है :-

"क़द्र दाँ हर जगह मयस्सर हैं
आदमी में कोई कमाल तो हो"

आप शायद यक़ीन नहीं करेंगे कि मुझे आपकी तलाश बहुत दिनों से थी ,अब महसूस हो रहा है कि वो तलाश ख़त्म हुई ,आपसे एक गुज़ारिश है कि मेरी ग़ज़लों को और बारीक छलनी में छानें,जब मैंने मेरे बेटे से यह ग़ज़ल पोस्ट करने को कहा तो वो कहने लगा,अब बस भी करो पापा,इक़बाल की ज़मीन में कितने शैर कहोगे,कोई दूसरी ग़ज़ल पोस्ट कर दो ,लेकिन ये क्या जाने कि मुझे जिन अशआर पर दाद लेना थी वो मुझे मिल गई ,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on May 30, 2015 at 10:28pm
जनाब "जान" गोरखपुरी जी,आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on May 30, 2015 at 10:26pm
जनाब केवल प्रसाद जी,आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।

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