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हो चुकी हो तुम एक पाषाण

वो एहसासों की लहरों पे तैरना

धड़कनों को खामोशीओं में सुनना

होठों को छू लेने की तड़प

आगोश में भर लेने की चसक

सब रेत के घरोंदे थे .........

रेत के इन घरोंदों को

तूफ़ान से पहले क्यूँ खुद ही ढाना पड़ता है !

चादर में ग़मों की फटन को

वक़्त के धागे से क्यूँ ख़ुद ही सीना पड़ता है !

नींद के आगोश में

मरे हुए ख़वाबों को क्यूँ खुद ही ढोना पड़ता है !

उमंगों के उड़ते परिंदों को

दर्द के दरिया में क्यूँ ख़ुद ही डुबोना पड़ता है !

पाषाण नहीं पिघलते कभी ......

बार बार ये बात ख़ुद को समझाना पड़ता है !!

******************************************************

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 27, 2015 at 6:48am

आदरणीय 'जान' साब ....सराहना हेतु आभार ...(सर कह कर इतना ना चढायें गिरने पे चोट लग सकती है ....हाहा ...) 

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 27, 2015 at 6:44am

आदरणीय  शिज्जु "शकूर" जी उत्साहवर्धन हेतु बहुत बहुत आभार....सादर 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 26, 2015 at 4:23pm

सुन्दर कविता पर मुबारकबाद आदरणीय 'इन्तजार' सर जी!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 26, 2015 at 9:19am

भावपूर्ण रचना है सेठी जी बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 24, 2015 at 1:12pm

आदरणीय Shyam Narain Verma जी पसंदगी के लिये हार्दिक धन्यवाद 

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 24, 2015 at 1:11pm

आदरणीय Dr. Vijai Shanker जी आपको अच्छी लगी ...प्रोत्साहन के लिये बहुत बहुत आभार

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 24, 2015 at 1:09pm

आदरणीय Er. Ganesh Jee "Bagi" जी मार्गदर्शन करते रहें ...सराहना हेतु बहुत बहुत आभार

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 24, 2015 at 1:07pm

आदरणीय जितेन्द्र पस्टारिया जी बहुत बहुत धन्यवाद 

Comment by Shyam Narain Verma on April 24, 2015 at 10:16am

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति  iहार्दिक बधाई ....

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 23, 2015 at 10:38pm
आदरणीय मोहन सेठी जी,
बहुत खूब , बहुत खूब , बहुत खूब , बहुत बहुत बधाई ,
चलते चलते , कुछ कहूँ ,
पत्थरों से दिल
लगाने से बेहतर है ,
उन्हें पूजिए ,
सुकून तो मिलेगा।
सादर।

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