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हाँ ये खबर जफ़ा की, बनाई हुई तो है - ग़ज़ल

221 2121 1221 212

लोगों के दरमियान उड़ाई हुई तो है

हाँ ये खबर जफ़ा की, बनाई हुई तो है

 

हों तेरे दिल में रश्क़ो हसद तो हुआ करे

आखिर ये आग तेरी लगाई हुई तो है

 

सच ही कहा ये आपने आज़ार देखकर

इक चोट मेरे दिल ने भी खाई हुई तो है

 

गलियों में ये पड़े हुए खाशाक* देखिये                *कूड़ा करकट

इस शह्र में कहीं पे सफाई हुई तो है

 

चटखी हैं उँगलियाँ वो भुजायें फड़क गईं

शामत किसी की “आप” में आई हुई तो है

 

काली घटा ठहर गई है आसमान पर

आखिर बरसती क्यों नहीं छाई हुई तो है

 

किरदार याद आ रहे हैं एक-एक कर

रूदाद ये किसी की सुनाई हुई तो है

 

खामोश हो गये मेरे आने से क्यों सभी

हाँ मुझसे कोई बात छुपाई हुई तो है

-मौलिक व अप्रकाशित

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 8, 2015 at 9:50am

आदरणीय मिथिलेश जी अभी मैं उस्ताद जैसे भारी भरकम शब्दों के काबिल नहीं हुआ हूँ, ये आपकी मुहब्बत है जो आप इस खाकसार को इतना मान दे रहे हैं। आपका बहुत बहुत शुक्रिया 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 8, 2015 at 9:48am

आदरणीया डॉ प्राची जी काफी समय बाद आपको देख कर अच्छा लगा आप जैसे रचनाकारों की कमी अक्सर महसूस होती है, रचना की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 7, 2015 at 9:36pm

क़्या बात है , आ. शिज्जु भाई , बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है , हार्दिक बधाइयाँ ।

खामोश हो गये मेरे आने से क्यों सभी

हाँ मुझसे कोई बात छुपाई हुई तो है  --- लाजवाब शे र ॥ ढेरों बधाई ॥

Comment by maharshi tripathi on April 7, 2015 at 9:33pm

वाह !! क्या खूबसूरत गजल हुई है ,,सादर बधाई आपको आ. शिज्जु "शकूर जी |

Comment by वीनस केसरी on April 7, 2015 at 8:39pm

खामोश हो गये मेरे आने से क्यों सभी

हाँ मुझसे कोई बात छुपाई हुई तो है

क्या कहने भाई वाह वा

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 7, 2015 at 8:25pm
गलियों में ये पड़े हुए खाशाक देखिये
इस शह्र में कहीं पे सफाई हुई तो है ॥
बहुत खूब , सुन्दर , बधाई आदरणीय शिज्जु शकूर जी , सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 7, 2015 at 7:38pm
वाह वाह वाह
आदरणीय शिज्जु भाई जी आजकल आप एक से बढ़कर एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहे है। सभी अशआर पर ढेर ढेर दाद। मुकम्मल ग़ज़ल पर दिल से बधाई। आपकी ग़ज़लों में अब उस्तादों वाली बात आ गई है। इस कमाल पर बहुत बहुत बधाई।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 7, 2015 at 4:50pm

आदरणीय शिज्जू शकूर जी 

चटखी हैं उँगलियाँ वो भुजायें फड़क गईं

शामत किसी की “आप” में आई हुई तो है................. हालात-ए-हाजरा पे बहुत सटीक शेर हुआ है 

खामोश हो गये मेरे आने से क्यों सभी

हाँ मुझसे कोई बात छुपाई हुई तो है...................... बहुत खूबसूरती से 'बात छुपाए जाने के पल को' शेर में बाँधा है 

उम्दा ग़ज़ल हुई है

बहुत बहुत बधाई 

 

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