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गलत करने का हक़ -- डा० विजय शंकर

सही होने ,
सही कहने ,
सही करने का
अधिकार किसको चाहिए ॥
किसी को थोड़ा ,
किसी को ज्यादा ,
गलत कर लेने का
हक़ सबको चाहिए ॥
किसी-किसी को तो
गुनाह करने का अख्तियार ,
भी बेइंतिहा चाहिए ॥

दुनियाँ को अच्छा होना चाहिए ।
हमारे गुनाहों पे पर्दा होना चाहिए ।
हमारे गलत कामों पर चुप,
निगाह नीची , और चर्चा पर
कठोर प्रतिबंध होना चाहिए ।
दुनियाँ में कुछ तो
शर्म-औ-हया होनी चाहिए ।
हम हैं तो ये जहांन है, ज़माना है,
दुनियाँ को हमारा
शुक्रगुजार होना चाहिए ॥
क्या फरक पड़ता है ,
कोई दब गया पैरों के नीचे हमारे ,
या किसी के अरमान कुचल गए,
या मंसूबे किसी के डूब गए सारे ,
लोग तो बस हमारी आरती उतारें
सुबह - शाम पूजे पाँव हमारे ,
क्योंकि हमीं तो उनकें हैं पालनहारे,
हमीं तो उनकें, सबके हैं पालनहारे।।

मौलिक एवं अप्रकाशित.
डा० विजय शंकर

Views: 707

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Comment by Dr. Vijai Shanker on April 1, 2015 at 8:52am
प्रिय जितेंद्र जी , आपकी प्रशस्ति के लिए आभार , बधाई के लिए धन्यवाद, सादर।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 1, 2015 at 8:45am

बहुत सुंदर. सामयिक कटाक्ष करती पंक्तियों पर बहुत-बहुत बधाई ,आदरणीय डा.विजय जी

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 31, 2015 at 9:35pm
आदरणीय श्याम मठपाल जी , प्रस्तुति आपको पसंद आई , बहुत बहुत आभार , बधाई हेतु ह्रदय से धन्यवाद, सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 31, 2015 at 9:32pm
प्रिय कृष्ण मिश्रा जी , प्रस्तुति को आपकी स्वीकृति मिली, आभार , बधाई हेतु ह्रदय से धन्यवाद, सादर।
Comment by Shyam Mathpal on March 31, 2015 at 8:14pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर जी, 

क्या बात कही आपने. अपने लिए कुछ और औरों के लिए कुछ और. ढेरों बधाई .

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 31, 2015 at 5:04pm

बहुत सुन्दर! दोआयामी दुनिया का सुन्दर चित्रण!बहुत बहुत बधाईयां आदरणीय!

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 31, 2015 at 10:10am
आदरणीय शिज्जु शकूर जी , आपकी प्रशस्ति के लिए आभार , बधाई हेतु बहुत बहुत धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 31, 2015 at 10:08am
आदरणीय लक्षमण धामी जी आपका बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 31, 2015 at 9:31am

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर लाजवाब रचना है बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 31, 2015 at 6:17am

आ0 भाई विजय शंकर जी इस व्यंग्यात्मक कविता के लिए हार्दिक बधाई ,

कृपया ध्यान दे...

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