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इच्छायें और चाहतें -- डॉo विजय शंकर

चाहतें इतनी ,
ये मिल जाता ,
वो मिल जाता ,
जो चाहा वो मिल जाता ,
कितना अच्छा हो जाता ।
चाहतें ही चाहतें
इच्छाओं की क्या कहें ,
पनपती ही नहीं ,
चाहतें हैं कि कम होती ही नहीं ,
इच्छायें है कि जनम लेतीं ही नहीं ,
इच्छा को इच्छा - शक्ति चाहिये ,
तभी फलीभूत होती है ,
चाहतें स्वयं सशक्त होती हैं।
बढ़ती हैं, अपने आप ,
देख के दूसरों को बढ़ती हैं ,
इच्छाएं नहीं बढ़ती हैं ,
स्वयं तो बिकुल नहीं ,
इच्छा को वहां भी शक्ति चाहिये ,
चाहतें तो उत्कण्ठा होती हैं ।
उनकीं भी चाहतें हैं ,
बड़ी-बड़ी , गहरी-गहरी , तीव्र वाली,
वो उनकीं पूर्ति में लगे रहते हैं, पूरे मनोयोग से,
इच्छाओं के लिए वे जन-समुदाय को देखतें हैं ,
चाहते हैं ,जन-समुदाय इच्छा पैदा करे,
देश के लिए कुछ करे,
इच्छा - शक्ति विकसित करे ,
देश का कल्याण करे ,
जन-समुदाय की इच्छा क्या माने रखती है,
पांच वर्ष पर मुखरित होती है ,
बाकी ,उनकीं चाहतों के नीचे दबी रहती है,
इच्छा को शक्ति मिले कहाँ से ,
जब उनकी नीयत ही नहीं होती है ॥

मौलिक एवं अप्रकाशित.
डा० विजय शंकर

Views: 594

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Comment by Dr. Vijai Shanker on March 27, 2015 at 12:57am
बहुत बहुत आभार , आदरणीय सुश्री मीणा पाठक जी , सादर
Comment by Meena Pathak on March 26, 2015 at 9:06pm

बहुत सुन्दर रचना सर | सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 26, 2015 at 10:48am
आदरणीय हरी प्रकाश गुप्ता जी , आपको रचना पसंद आई , आपका आभार , आपकी बधाई एवं शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद, सादर।
Comment by Hari Prakash Dubey on March 26, 2015 at 9:32am

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर , सुन्दर रचना है ,.........चाहतें हैं कि कम होती ही नहीं ,
इच्छायें है कि जनम लेतीं ही नहीं ,......चाहत और इच्छा....एक अलग प्रकार का विश्लेषण , हार्दिक बधाई ! सादर

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 26, 2015 at 3:49am
आदरणीय गिरिराज भंडारी जी , आपको स्पष्ट स्वीकृति एवं प्रशस्ति हेतु आपका आभार , आपकी बधाई हेतु धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 26, 2015 at 3:48am
आदरणीय डॉo आशुतोष मिश्रा जी , आपको रचना अच्छी लगी , आपका आभार , आपकी बधाई हेतु धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 26, 2015 at 12:59am
आदरणीय मोहन सेठी जी , आपको रचना पसंद आई , उसे सार्थकता मिली , आभार , धन्यवाद , सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 25, 2015 at 10:36pm

आदरणीय विजय भाई , हमेशा की तरह एक और सच्चाई से रू बरू  कराती आपकी रचना के लिये हार्दिक बधाई !

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 25, 2015 at 5:09pm

आदरणीय विजय सर ..वर्तमान पर्द्रिश्य पर सुंदर कटाक्ष करती शानदार रचना के लिए तहे दिल बधाई सादर 

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 25, 2015 at 11:40am

आदरणीय सही कहा आप ने ....

पांच वर्ष पर मुखरित होती है ,
बाकी ,उनकीं चाहतों के नीचे दबी रहती है,
इच्छा को शक्ति मिले कहाँ से ,

कृपया ध्यान दे...

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