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चलते चलते ……

1.

एक कतरा
देर तक
बहते बहते
कपोल पर ही सो गया
शायद
अभी इंतज़ार बाकी था

2.

ये अलस्सुब्ह
किसकी नमी को छूकर
बादे सबा आई है
खुली पलक का
कोई ख़्वाब
सिसकता रह गया शायद

3.

तेरे हर वादे पे
यकीं करता रहा
पर तुझे यकीं न आया
मैं हर लम्हा तुझपे
सौ सौ बार मरता रहा
मेरी मौत को भी तूने
मेरी नींद समझा
नज़र भर के भी तूने
न देखा मुझको
गो चहरे से कफ़न
बार बार हटता रहा

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on March 24, 2015 at 7:19pm

आदरणीय   Mohan Sethi 'इंतज़ार'   जी रचना पर आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on March 24, 2015 at 7:19pm

आदरणीय krishna mishra 'jaan'gorakhpuri    जी रचना पर आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on March 24, 2015 at 7:18pm

आदरणीय  Dr. Vijai Shanker  जी रचना पर आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Samar kabeer on March 24, 2015 at 4:53pm
जनाब सुशील सरना जी,आदाब,सुन्दर रचना के लिये बधाई स्वीकार करें,आपने "अल सुबह" शब्द का इस्तेमाल किया है,सही शब्द " अलस्सुब्ह" है |
Comment by Shyam Mathpal on March 24, 2015 at 11:30am

सुंदर रचना के लिए बधाई .

Comment by savitamishra on March 24, 2015 at 11:19am

बहुत ही सुन्दर

Comment by vijay nikore on March 24, 2015 at 10:46am

अति सुन्दर अभिव्यक्ति। बधाई।

Comment by Shyam Narain Verma on March 24, 2015 at 10:07am
इस सुंदर प्रस्तुति के लिए तहे दिल बधाई सादर
Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 24, 2015 at 7:50am

बहुत खूब कहा ...बधाई .....सादर 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 23, 2015 at 8:40pm

खुली पलक का
कोई ख़्वाब
सिसकता रह गया शायद!

बहुत पसंद आई आपकी कविताए!हार्दिक बधाईयां!

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