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ग़ज़ल ------------------गुमनाम पिथौरागढ़ी

शहर में इक अजनबी घूमता है
शहर में इक अजनबी बेपता है

बंद हैं क्यों डर दिलों के यहाँ पर
शहर में इक अजनबी पूछता है

मजहबों के नाम पर मर रहे क्यों
शहर में इक अजनबी सोचता है

गाँव से लाया मुहब्बत आज देखो
शहर में इक अजनबी बांटता है

नाम वाले हैं कहाँ आज गुमनाम
शहर में इक अजनबी लापता है

गुमनाम पिथौरागढ़ी

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 501

Comment

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Comment by gumnaam pithoragarhi on March 16, 2015 at 7:50pm

शुक्रिया दोस्तों आप सभी का साथ हमेशा उत्साह देता है .......................

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 16, 2015 at 7:13pm

गजब है . वाह--- गुमनाम जी

अब आप सक्रिय सदस्य के रूप में पुरस्कृत है . आप गुमनाम नहीं रहे . आपको बहुत बहुत बधायी  .

Comment by Shyam Mathpal on March 16, 2015 at 3:48pm

Aadarniya Gumnami Ji,

Sundar rachna ke liye badhai.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 16, 2015 at 11:42am

आदरणीय अगुमनाम भाई , अच्छी गज़ल हुई है , बधाइयाँ ।

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 16, 2015 at 5:49am
सुन्दर, बधाई, आदरणीय गुमनाम जी, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 16, 2015 at 4:27am
सुन्दर ग़ज़ल बधाई
Comment by Hari Prakash Dubey on March 16, 2015 at 3:47am

वाह ,गुमनाम भाई ,सुन्दर प्रस्तुति ,बधाई आपको !

Comment by maharshi tripathi on March 15, 2015 at 9:51pm

मजहबों के नाम पर मर रहे क्यों

शहर में इक अजनबी सोचता है,,,,,,,,,,,,,, बहुत खूब!!!! आपको हार्दिक बधाई आ.gumnaam pithoragarhi जी |

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