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“बेटा!.. तुझे याद है न.. जब तू स्कूल में प्रथम श्रेणी  में आया था ,  मुझे कितनी ख़ुशी हुई थी . सभी लोग  यही कह रहे  थे  कि मेरा बेटा है" 

“ हाँ!..पर रात-दिन पढाई मैंने की थी, आपने जो किया था  वो आपका फर्ज था "

“ हाँ! बेटा यही समझ ले, बस मुझे इसी घर में रहने दे. अब गली-गली दरबदर फिरूंगा, तो लोग यही कहेंगे की तेरा बाप हूँ...”

    जितेन्द्र पस्टारिया

 (मौलिक व् अप्रकाशित )

 

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 25, 2015 at 11:38am

आदरणीय मिथिलेश जी, आपके विस्तृत प्रोत्साहन का ह्रदय से आभार. यह लेखनी का प्रभाव ओ.बी.ओ . मंच की ही देन है. बतौर पाठक मंच में शामिल होने के पश्चात, जो कुछ पाया यहीं से पाया है. आदरणीय गुरुजनों के सानिध्य व् स्नेहिल मार्गदर्शन ने ही लेखन को प्रभावशील बनाया है.

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 25, 2015 at 11:31am

आदरणीय महर्षि जी, आपके प्रोत्साहन हेतु आपका आभारी हूँ

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 25, 2015 at 11:30am

आदरणीया राजेश दीदी, लघुकथा पर आपकी विस्तृत प्रतिक्रिया हमेशा रचना को सार्थकता व् लेखनकर्म को मनोबल देती है. आपका ह्रदय से आभारी हूँ

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 25, 2015 at 11:27am

आदरणीया अर्चना जी, आपकी उपस्थिति व् प्रोत्साहन हेतु आपका बहुत-बहुत आभार

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 25, 2015 at 11:26am

आदरणीय विनय जी, आप जैसे लघुकथाकार से प्रोत्साहन पाना, मनोबल बढाता है. आपका आभारी हूँ

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 25, 2015 at 11:24am

आदरणीय श्याम नारायण जी, आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु आपका बहुत-बहुत आभार.

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 25, 2015 at 11:23am

आदरणीय डा.गोपाल जी, आपके स्नेहिल आशीर्वाद के लिए ह्रदय से आभारी हूँ

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 25, 2015 at 11:21am

आदरणीय डा.विजय जी, आपकी उपस्थिति व् आशीर्वाद से रचना को सार्थकता मिलती है. आपका ह्रदय से आभारी हूँ

सादर!

Comment by Hari Prakash Dubey on February 25, 2015 at 10:36am

आदरणीय  जितेन्द्र पस्टारिया सर .बहुत ही सशक्त रचना है "अब गली-गली दरबदर फिरूंगा, तो लोग यही कहेंगे की तेरा बाप हूँ" ये एक पंक्ति ही समस्त कथा बयान कर रही है की संवेदनायें मर चुकी हैं , सुन्दर ,सफल रचना पर बधाई आपको ! सादर 

Comment by khursheed khairadi on February 25, 2015 at 9:52am

लोग  यही कह रहे  थे  कि मेरा बेटा है" 

.............................................................

लोग यही कहेंगे की तेरा बाप हूँ...”

आदरणीय जितेंदर जी , विसंगति को क्या ख़ूब शब्द दिये है |पिता की कुंठा ,पुत्र की अवज्ञा ,समाज की असंवेदनशीलता सब कुछ उजागर कर दिया आपने |हार्दिक बधाई |सादर अभिनन्दन |

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