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॥ मै ईश्वर नहीं ॥ अतुकांत रचना ( गिरिराज भंडारी )

॥ मै ईश्वर नहीं ॥
**********
मै ईश्वर नहीं
किसी ईश्वरीय व्यवहार की उम्मीदें न लगायें
मै तो क्या कोई भी चाहे तो ईश्वर नहीं हो सकता

बस दूसरों में ईश्वरीय गुण खोजने में लगे रहते हैं
हम , आप , सब

इसलिये, आज
ये ऐलान है मेरा ,
मुझमें केवल इंसानी गुण ही हैं
अच्छों से उनसे अधिक अच्छा
बुरों से भरसक बुरा

उनके व्यवहार के प्रत्युत्तर में भेज रहा हूँ
कुछ दिल से निकली मौन गालियाँ
कुछ आत्मा से निकली बद दुआयें
जिसमें नत्थी है उनके व्यवहार की
एक छाया प्रति

इस सीख के साथ ,
क़समें खिला के ,
कि अगर अस्वीकृत कर दिये गये तो वापस न लौटें
घूमते रहें वहीं कहीं
आसपास ,
किसी मौके की तलाश में
उनके दिलो दिमाग मे घुस जाने के लिये
जिसके कि वो हक़दार हैं
******************
मौलिक एवँ अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 11, 2015 at 8:37am

आदरणीय मिथिलेश भाई , आपका दिली शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 11, 2015 at 8:37am

आदरणीय हरि प्रकाश भाई , सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 11, 2015 at 8:36am

आदारणीय विजय भाई , हौसला अफज़ाई का बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on February 10, 2015 at 10:29pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी,आदाब,बहुत ही सुन्दर रचना के लिये बधाई स्वीकार करें |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 10, 2015 at 9:08pm
आदरणीय गिरिराज सर, एक अलग विषय पर बिलकुल अलग अंदाज में सुन्दर कविता। हार्दिक बधाई।
Comment by Hari Prakash Dubey on February 10, 2015 at 6:55pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी सर……. मै ईश्वर नहीं

किसी ईश्वरीय व्यवहार की उम्मीदें न लगायें….. बहुत खूब ,हार्दिक बधाई आपको इस रचना पर ! सादर

 

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 10, 2015 at 6:16pm
व्यवहार का दार्शनिक उत्तर , कुछ अलग सी इस कविता के लिए बधाई, आदरणीय गिरिराज जी, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 10, 2015 at 4:44pm

आदरणीय सुशील भाई , रचना के अनुमोदन और सराहना के लिये आपका  हृदय से आभारी हूँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 10, 2015 at 4:43pm

आदरणीय जितेन्द्र भाई , हौसला अफज़ाई के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ।

Comment by Sushil Sarna on February 10, 2015 at 4:03pm

इस सीख के साथ ,
क़समें खिला के ,
कि अगर अस्वीकृत कर दिये गये तो वापस न लौटें
घूमते रहें वहीं कहीं
आसपास ,
किसी मौके की तलाश में
उनके दिलो दिमाग मे घुस जाने के लिये
जिसके कि वो हक़दार हैं

वाह आदरणीय वाह बहुत ही गहनता है आपकी इस रचना में … इस दार्शनिक प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय गिरिराज भंडारी जी।

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