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सुनो,

है ईश्वर ऐसा करो

मुझे पागल कर दो 

शरीर से दिमाग का 

संपर्क खत्म कर दो 

मेरे एहसास 

मेरी प्यास 

मेरी तृष्णा 

मेरा प्यार 

मेरी लालसा 

से मेरा नाता खत्म कर दो 

न मर्म रहे 

न भावना 

न दर्द रहे 

न रोग .... 

सुनो.... 

है ईश्वर ऐसा करो 

मुझे पागल कर दो 

जीवन तो तब भी रहेगा 

दौड़ेगा रगों मे खून 

देखुंगा, सुनुंगा 

खा भी लूँगा 

दोगे कपड़े तो पहन 

भी लूँगा 

न होगा तो केवल 

एहसास .... 

अपने और दूसरे 

की पहचान 

अच्छा क्या 

खराब क्या 

ईर्ष्य क्या 

दुलार क्या 

अपना कौन 

कौन बैगाना 

भूख है क्या 

प्यास क्या .... 

और ये सब जब थे ... 

तभी क्या था ... 

सुनो ... 

है ईश्वर ऐसा करो 

मुझे पागल कर दो .... 

( मौलिक एवं अप्रकाशित ) 

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Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on February 24, 2015 at 9:40pm
हे ईश्वर ऐसा करो
मुझे पागल कर दो ॥
वाह !
आप ईश्वर से यह मांग रहे हैं ,
कितने लोग ऐसे ही जी रहे हैं ,
जी क्या रहे हैं , बेहद खुश हैं ,
सारे सुख, भरपूर , भोग रहे हैं ,
यही तो बस जीवन रह गया है,
आदमी आदमी नहीं रह गया है,
पर दिखाता,जैसे खुश है भरपूर ,
जब कि है , चेतना शून्य भरपूर ॥
व्यंग बहुत अच्छा है , बहुत अच्छा लिखा है आपने , बहुत बहुत बधाई, आदरणीय आमोद कुमार जी, सादर।
Comment by Amod Kumar Srivastava on February 24, 2015 at 7:54pm

आदरणीय Er. Ganesh Jee धन्यवाद आपके प्रोत्साहन के लिए ... त्रुटियों पे ध्यान रखूँगा .... 

Comment by Amod Kumar Srivastava on February 24, 2015 at 7:53pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी आभार ..... 

Comment by Amod Kumar Srivastava on February 24, 2015 at 7:52pm

आदरणीय वामनकर जी बहुत बहुत धन्यवाद ....आपके प्रोत्साहन के लिए ... 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 2, 2015 at 10:44pm

आदरणीय अमोद जी,  सुन्दर प्रस्तुति पर बधाई आपको .  सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 2, 2015 at 8:16pm

आदरणीय अमोद जी, दो ही तरीके हैं ,एक आपने अभिव्यक्त कर दिया , और एक है की हम "निस्त्रैगुण्य" हो जायें ! सुन्दर प्रस्तुति पर बधाई आपको ! सादर 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 2, 2015 at 1:14pm

टंकण की त्रुटियों को देख लें आदरणीय अमोद जी, इस सुन्दर अभिव्यक्ति पर बधाई प्रेषित करता हूँ. 

कृपया ध्यान दे...

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