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हिम्मत साथ नहीं देती है

हिम्मत साथ नहीं देती है

किसको अपना दर्द बतायें कौन सुनेगा अपनी बात
सुनने वाले व्याकुल हैं अब अपना राग सुनाने को

हिम्मत साथ नहीं देती है खुद के अंदर झाँक सके
सबने खूब बहाने सोचे मंदिर मस्जिद जाने को

कैसी रीति बनायी मौला चादर पे चादर चढ़ती है
द्वार तुम्हारे खड़ा है बंदा , नंगा बदन जड़ाने को

दूध कहाँ से पायेंगें जो, पीने को पानी न मिलता
भक्ति की ये कैसी शक्ति पत्थर चला नहाने को

जिसे देखिये मिलता है अब चेहरे पर मुस्कान लिए
मुश्किल से मिलतें है अपने दिल से आज लगाने को

तेरी यादों की खुशबू अब मन उपवन महका देती है
फिर से आज ग़ज़ल निकली है महफ़िल को महकाने को

मौलिक और अप्रकाशित

प्रस्तुति
मदन मोहन सक्सेना

Views: 516

Comment

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Comment by Rahul Dangi Panchal on January 24, 2015 at 7:13pm
सुन्दर रचना !
Comment by Ram Ashery on January 24, 2015 at 3:26pm

बधाई हो भाई अपने बहुत ही अच्छे ढंग से शब्दों का चयन किया और एक अच्छी  कविता का सृजन किया  


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 22, 2015 at 10:17pm

भावनाओं की अच्छी अभिव्यक्ति बधाई, टंकण त्रुटियों को एक बार देख लें, बधाई प्रेषित करता हूँ.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 22, 2015 at 8:15pm

रीत प्रीत की सच्ची बातों से गुलशन महकाने को 

आये लेकर सुन्दर रचना मोहन जी समझाने को 

मंदिर मस्जिद भक्ति शक्ति कितनी बातें साझा की 

बहुत बधाई हम देते है दिल से इस अफ़साने को 

Comment by Hari Prakash Dubey on January 22, 2015 at 8:03pm

फिर से आज ग़ज़ल निकली है महफ़िल को महकाने को....सुन्दर रचना आदरणीय मदन मोहन जी !

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