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युग्मों का गुलदस्ता …

युग्मों का गुलदस्ता …


एक  पाँव  पे  छाँव  है  तो  एक  पाँव  पे   धूप
वर्तमान  में  बदल  गया  है  हर रिश्ते का रूप


अब  मानव  के  रक्त  का  लाल  नहीं   है   रंग
मौत  को  सांसें  मिल  गयी  जीवन हारा  जंग


निश्छल प्रेम अभिव्यक्ति के बिखर गए हैं पुष्प
अब  गुलों  के  गुलशन  से  मौसम  भी  हैं रुष्ट


तिमिर  संग  प्रकाश  का  अब  हो गया  है मेल
शाश्वत  प्रेम अब बन गया है शह मात का खेल


नयन  तटों  पर  अश्रु  संग  काजल  करे पुकार
पिया  मिलन  को  धधक  रहे  अधरों पे  अंगार

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on January 16, 2015 at 9:30am

आदरणीय    khursheed khairadi    जी युग्मों पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। प्रत्युत्तर में विलम्ब के लिए क्षमा चाहूंगा। 

Comment by Sushil Sarna on January 16, 2015 at 9:30am

आदरणीय    गिरिराज भंडारी   जी युग्मों पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। प्रत्युत्तर में विलम्ब के लिए क्षमा चाहूंगा। 

Comment by Sushil Sarna on January 16, 2015 at 9:30am

आदरणीय   Hari Prakash Dubey   जी युग्मों पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। प्रत्युत्तर में विलम्ब के लिए क्षमा चाहूंगा। 

Comment by Sushil Sarna on January 16, 2015 at 9:28am

आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव  जी रचना  पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। आपके सुझाव का मैं तहे दिल से स्वागत करता हूँ आपने इतना समय दिया इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ सर। 

Comment by khursheed khairadi on January 11, 2015 at 7:06pm

आदरणीय सुशील सरना सर  ,सुन्दर प्रस्तुति है |सादर अभिनन्दन 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 10, 2015 at 8:09pm

आदरणीय सुशील सरना भाई , बहुत सुन्दर भाव पूर्ण युग्म  रचे हैं आपने , हार्दिक बधाइयाँ स्वेकार करें । आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी की बात से सहमत हूँ , दोहों के बहुत करीब रचना है , चाहें तो दोहों मे बदल सकते हैं । सादर ।

Comment by Hari Prakash Dubey on January 10, 2015 at 5:49pm

तिमिर  संग  प्रकाश  का  अब  हो गया  है मेल 
शाश्वत  प्रेम अब बन गया है शह मात का खेल......इस शानदार रचना के लिए हार्दिक  बधाई , आदरणीय सुशील सरना जी . सादर !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 10, 2015 at 2:05pm

आदरणीय सरना जी

आपके युग्म  दोहा विधा के इतने नजदीक थे कि मैं अपने को रोक नहीं सका और उनका संपादन कर दिया i कोई रचना यदि किसी छंद विधा के आस पास हो तो छंद को फिर स्वीकार ही क्यों न कर लिया जाय i  मैंने शब्द आपके ही यथासंभव रखे ---  खैर  i आपकी काव्य भावनाओं का मैं हमेशा ही  प्रशंसक रहा  हूँ i इसमें संदेह नहीं है कि आप अच्छा  बहुत अच्छा  लिखते है i सादर i

Comment by Sushil Sarna on January 10, 2015 at 1:05pm

आदरणीय  ajay sharma जी युग्मों पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। आपका सुंदर सुझाव का हार्दिक आभार लेकिन मुझे मेरे सृजन में भी कोई त्रुटि या गेयता में कोई ख़ास फर्क नज़र नहीं आ रहा।आपके स्नेह का हार्दिक आभार।   

Comment by Sushil Sarna on January 10, 2015 at 1:02pm

आदरणीय   मिथिलेश वामनकर  जी युग्मों पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

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