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“अब पर्वतों पर पत्थर उगा करतें हैं”

लेकर बेठे हो, सारी नदियाँ

अनंत मूल्यवान, वनस्पतियाँ

भरपूर वन्य-जीव प्रजातियाँ   

दिव्य देवताओं की, सम्पतियाँ

फिर भी करते  रहते हो तुम

हरे भरे हिमालय,  के लिए

आन्दोलन पर  आन्दोलन

दिल्ली दरबार, वातानुकूलित कमरे

निशा में, आचमन पर आचमन

हमसे पूछो, हम कैसे जीते हैं

अपनी आँखों के आंसू पीते हैं

यहाँ सूख चुकी सारी नदियाँ

नष्ट हो गयी वनस्पतियाँ

लुप्तप्राय वन्य जीव प्रजातियाँ

लुट गयी  देवों की सम्पतियाँ             

अब तुम हमको न बहलाओ

थोड़ी कृपा हम पर बरसाओ

हमारे जख्मों पर मरहम लगाओ

खुशनसीब हो तुम्हारे यहाँ

देवी और  देवता रहा करतें हैं

हमारे यहाँ तो अब पर्वतों पर

पत्थर उगा करते हैं !!

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on January 10, 2015 at 6:39pm

प्रिय सोमेश भाई आपकी प्रतिक्रिया, विश्लेषण उत्साहवर्धन और सराहना हेतु दिल से आभार !

Comment by Hari Prakash Dubey on January 10, 2015 at 6:35pm

उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय खुर्शीद खैराड़ी साहब सादर! 

Comment by Hari Prakash Dubey on January 10, 2015 at 6:33pm

रचना  की सराहना के लिए हार्दिक आभार आदरणीय गिरिराज भंडारी सर , आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहती है ,सादर !.

Comment by Hari Prakash Dubey on January 10, 2015 at 6:30pm

आदरणीय सुशील सरना  सर आपने कविता को पढ़ कर सार्थक प्रतिक्रिया दी उसके लिए हार्दिक आभारी हूँ ,सादर

Comment by Hari Prakash Dubey on January 10, 2015 at 6:24pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार सादर!

Comment by Hari Prakash Dubey on January 10, 2015 at 6:21pm

रचना पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार आदरणीय  laxman dhami  जी .

Comment by somesh kumar on January 8, 2015 at 4:33pm

अंतिम चार पंक्तियों ने जो भाव ,सम्वेदना प्रकट की उसकी समाजिक और नैतिक दृष्टी इतनी गहरी है की क्या कहा जाए ,यह प्रक्रति के बदलते स्वरूप और उससे होने वाली आपदाओं का संकेतक भी है ,रचना पर हार्दिक बधाई 

Comment by khursheed khairadi on January 8, 2015 at 3:06pm

खुशनसीब हो तुम्हारे यहाँ

देवी और  देवता रहा करतें हैं

हमारे यहाँ तो अब पर्वतों पर

पत्थर उगा करते हैं !!

 आदरणीय हरिप्रकाश जी ,सुन्दर रचना है |सादर अभिनन्दन 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 8, 2015 at 1:48pm

अच्छी रचना हुई है आदरणीय है प्रकाश भाई , रचना के लिये हार्दिक बधाई ।

Comment by Sushil Sarna on January 8, 2015 at 12:42pm

अब तुम हमको न बहलाओ
थोड़ी कृपा हम पर बरसाओ
हमारे जख्मों पर मरहम लगाओ
खुशनसीब हो तुम्हारे यहाँ
देवी और देवता रहा करतें हैं
हमारे यहाँ तो अब पर्वतों पर
पत्थर उगा करते हैं !!
…वाह आदरणीय बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति .... अंतिम पंक्ति दूर तक असर करती हैं। इस सुंदर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई।

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