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ग़ज़ल- छुट्टियों के दिन

मस्कुराते हैं छुट्टियों के दिन
कम ही आते हैं छुट्टियों के दिन

कंपकंपाते हैं छुट्टियों के दिन  

थरथराते हैं छुट्टियों के दिन 

देखो सचमुच में थक गये हैं हम,
ये बताते हैं छुट्टियों के दिन


सैंकडों काम छोड कर बाकी
भाग जाते हैं छुट्टियों के दिन


सपनों के बोझ में दबे बच्चे
खेल पाते हैं छुट्टियों के दिन


चार दिन घर में रह नहीं पाये,
अब थकाते हैं छुट्टियों के दिन

आदतें और थकान,आलस को 

और बढाते हैं छुट्टियों के दिन  

दफ़्तरों में छुपे कबूतर को 

मुंह चिढाते हैं छुट्टियों के दिन  

जैसे बरसों से भूखे-प्यासे थे  

खूब खाते हैं छुट्टियों के दिन 

सूबे सिंह सुजान

मौलिक व अप्रकाशित 

Views: 731

Comment

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Comment by सूबे सिंह सुजान on January 5, 2015 at 10:55pm
Hari Prakash Dubey
बहुत बहुत शुक्रिया
Comment by सूबे सिंह सुजान on January 5, 2015 at 10:53pm
Shyam Narain Verma
जी सादर आपका धन्यवाद है।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 5, 2015 at 8:49pm

सुन्दर प्रस्तुति पर बधाई आपको आदरणीय सूबे सिंह सुजान जी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 5, 2015 at 7:47pm

अच्छा प्रयास i

Comment by Hari Prakash Dubey on January 5, 2015 at 6:28pm

इस सुन्दर प्रयास पर बधाई आपको आदरणीय सूबे सिंह सुजान जी !

Comment by Shyam Narain Verma on January 5, 2015 at 10:22am

खुबसूरत ग़ज़ल हुई है |सादर अभिनन्दन |

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