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ग़ज़ल---उमेश कटारा

मुहब्बत का ज़ला हूँ मैं,पिघलता ही रहा हूँ मैं
ख़ुदा से माँगकर तुझको,भटकता ही रहा हूँ मैं
................
समन्दर के किनारों ने समेटा है बहुत मुझको
मगर आँखों की कोरों से निकलता ही रहा हूँ मैं
................
अगर सच बोलता हूँ तो,समझते हैं मुझे पागल
मगर सच्चाई को लेकर ,उबलता ही रहा हूँ मैं
................
सितारों की कसम ले ले,नजारों की कसम ले ले
तेरे दीदार की ख़ातिर मचलता ही रहा हूँ मैं
.................
मेरी किस्मत के सौदागर ,मुझे इन्साफ तो दे दे
मेरी तनहाई को लेकर, सिमटता ही रहा हूँ मैं
................
उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by umesh katara on December 8, 2014 at 8:20pm

narendrasinh chauhan जी शुक्रिया

Comment by umesh katara on December 8, 2014 at 8:19pm
Comment by umesh katara on December 8, 2014 at 8:19pm

शुक्रिया Er. Ganesh Jee "Bagi"जी

Comment by umesh katara on December 8, 2014 at 8:19pm

शुक्रिया rajesh kumari जी

Comment by umesh katara on December 8, 2014 at 8:18pm

शुक्रियाRahul Dangi जी

Comment by Rahul Dangi Panchal on December 8, 2014 at 3:09pm
बहुत सुन्दर वाह! बधाई हो!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 8, 2014 at 11:23am

समन्दर के किनारों ने समेटा है बहुत मुझको
मगर आँखों की कोरों से निकलता ही रहा हूँ मैं---बहुत खूब 

सुन्दर ग़ज़ल हुई है आ० उमेश जी बहुत- बहुत बधाई 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 7, 2014 at 6:33pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है , बधाई कटारा जी। 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 7, 2014 at 1:42pm

कटारा जी

बहुत उम्दा i  बधाई i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 7, 2014 at 12:25am

 अच्छी ग़ज़ल .... अच्छे अशआर ....बहुत बधाई ..........

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