For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल बदला बदला सा घर नज़र आया।

2122 12 12 22

बदला बदला सा घर नज़र आया।
जब कभी मैं कही से घर आया।

बस तुझे देखती रही आँखें।
हर तरफ तू ही तू नज़र आया।

छोड़ कर कश्तियाँ किनारे पर।
बीच दरिया में डूब कर आया।

यूँ हज़ारो हैं ऐब तुझमे भी।
याद मुझको तेरा हुनर आया।

नींद गहरी हुई फिर आज "कमाल"।
ख्वाब उसका ही रात भर आया।

मौलिक एवम अप्रकाशित
केतन "कमाल"

Views: 1201

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Ketan Kamaal on November 25, 2014 at 11:40am

गणेश जी शुभ प्रभात

मात्रा पतन करने का मतलब मात्रा घटाना नहीं होता जैसे की मैं आपकी टिपणी में देख रहा हूँ।
मात्रा गिराने का मतलब ये है की उस जहाँ भी मात्रा गिराई गयी है वहाँ शायर अपनी लयकारी से कम ज़ोर देकर पढता है।

कुछ example आपके लिए नीचे दे रहा हूँ।

२ चुप १ के चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है।
२ हम १ को अब तक आशक़ी का वो ज़माना याद है।

बना १ है शाह १ का मुसाहिब फिरे १ है इतराता।
वगर १ ना शह्र में ग़ालिब १ की आबरू क्या है।

उपरोक्त अशआर में आप देख सकते है आ की मात्रा ई की मात्रा और ऐ की मात्रा को भी गिराया गया है।

मात्रा गिराना शायर की लयकारी पर है वो जहाँ ज़रुरत हो वहाँ मात्रा गिराकर पढ़ सकता हैं।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on November 25, 2014 at 9:24am

केतन जी आप दुरूस्त फरमाते हैं  और आपकी गजल भी दुरूस्त है। खूबशूरत गजल के लिये बधाई।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 24, 2014 at 11:09pm

प्रथम टिप्पणी देवनागरी नहीं होने से मैं कुछ समझ नहीं सका। मकता का मिसरा उला अलिफ वस्ल के हिसाब से वाजिब है। बदला में ला को एक मात्रा में बाँधना मुझे वाजिब नहीं लग रहा।

Comment by Ketan Kamaal on November 24, 2014 at 11:08pm
बाक़ी सब आदरणीय साथियों का तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ। गणेश जी और गिरिराज जी आपका भी शुक्रिया
Comment by Ketan Kamaal on November 24, 2014 at 11:06pm
Aur aese kai example men de sakta hun jisme ki matra ae ke matra bhi giraayi gai hai aik famouse ghazal hai

2 चुप 1 के चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है।
2 हम 1 को अब तक आशक़ी का वो ज़माना याद है।

2 दिल 1 के अरमाँ आसुंओं में बाह गए।
हम वफ़ा करके 1 भी तनहा रह गए।

वस्ल का example नीचे है

दिल ए नादाँ तुझे हुआ क्या है।
आखिर इस दर्द की दवा क्या है।

ग़ालिब के इस खूबसूरत मतले में दूसरे मिसरे पर गौर फरमाये

आखिर इस = आखिरिस = 212
दर्द = 21 की दवा = 212 क्या हऐ = 22

वैसे ही

नींद गहरी हुई फिर आज कमाल
21 नींद 22 गहरी 12 हुई 12 फिरा 112 जकमाल
आखरी में इस बह्र की छूट का फायदा उठाते हुवे एक मात्र एक्सट्रा है जो गाते वक़्त लुप्त हो जाती है।

आशा है ये मेरी ग़ज़ल को बह्र में साबित करने के वास्ते बहुत है? गिरिराज जी आशा है आपकी शंका भी दूर हुई होगी।
Comment by Ketan Kamaal on November 24, 2014 at 10:46pm
Ganesh baghi sahab aapka bahut bahut shukriya aapne aPNA kimati waqt mujh naacheez ki ghazal par diya

Matra girane ka matlab ye nahin hai ki aap alfaaz se matra hi hata de. Ghazal men matra girane ke mani hai voice modulation aik example B

Wagarna Shehr Men Ghalib Ki Aabroo Kya Hai.
Upar diye misare men WAGARNA shabd ka NA Ghalib ne giraya hai aur jab is misare ko aap padhenge to WAGARN nahin hoga WAGARNA hi rahega magar NA par halka zor aayega jisase shabf ke maani bhi na badale aur Behr bhi aasaani se nibh jaaye. Aur ab maqte ka pahla Misara

२१NEEND २२GAHRI १२ HUI १२PHIRAA १J १२ KAMAAL

JAISE KI IS BEHR KA NIYAM HAI AIK MATRA KI CHHOOT TO POORI GHAZAL WAZN MEN DURUST HAI AAP PHIR SE GAUR KARIYE AUR HO SAKE TO VENUS SAHAB SE SALAAH KAR LEN AIK BAAR

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 24, 2014 at 10:25pm

आदरणीय कमाल भाई , ग़ज़ल खूबसूरत कही है , दिली बधाई स्वीकार करें । आ. बाग़ी जी का कहना सही है -

नींद गहरी हुई फिर आज "कमाल" -- ये मिसरा बे बहर हो गया है , देख लीजियेगा ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 24, 2014 at 9:53pm

बदला बदला सा घर नज़र आया।
बदला 112 या 22 को आप 21 में कैसे बाँध सकते हैं, बदला और बदल दोनों अर्थ रखते हैं।

मकता का मिसरा उला बेबहर हो गया है।

शेष ग़ज़ल अच्छी लगी, बधाई प्रेषित है आदरणीय केतन कमाल जी।

Comment by Hari Prakash Dubey on November 24, 2014 at 8:54pm

नींद गहरी हुई फिर आज "कमाल"। 
ख्वाब उसका ही रात भर आया।...बहुत खूब कमाल साहब ,बधाई 

Comment by somesh kumar on November 24, 2014 at 8:45pm

सुंदर गज़ल कमाल भाई 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Tuesday
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Tuesday
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Jul 11
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Jul 10
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Jul 9
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Jul 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service