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"थोड़ी अपनी ही ज़वानी कहो"

बच्चे सोयें वो कहानी कहो।
थोड़ी अपनी ही जवानी कहो।।

बुढ़ापे का ज़ख्म अब रफ़ू करो।
आँसुओं को फिर से पानी कहो।।

ये शहर रौशन नहीं वर्षों से।
इक शाम ही सही सुहानी कहो।।

मोहब्बत का महकता ख़त रहा।
कभी बातें वही पुरानी कहो।।

बहुत ख़त लिखे बहुत ख़त पढ़े।
अब दिल की बातें जबानी कहो।।
**********************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक। अप्रकाशित

Views: 704

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Comment by ram shiromani pathak on November 13, 2014 at 2:45pm

बहुत  बहुत आभार आदरणीय विजय निकोर जी///सादर  

Comment by ram shiromani pathak on November 13, 2014 at 2:44pm

बहुत  बहुत आभार आदरणीय आलोक मित्तल जी///सादर  

Comment by vijay nikore on November 10, 2014 at 4:56pm

इस अच्छी गज़ल के लिए बधाई, आ० राम जी।

Comment by Alok Mittal on November 10, 2014 at 12:56pm

शानदार ..बहुत उम्दा .....

ये शहर रौशन नहीं वर्षों से।
इक शाम ही सही सुहानी कहो...वाह्ह

बहुत बधाई आपको

Comment by ram shiromani pathak on November 9, 2014 at 1:27pm

अमूल्य सुझाव हेतु बहुत बहुत आभार आपका आदरणीय गणेश जी /// सादर 

Comment by ram shiromani pathak on November 9, 2014 at 1:26pm

आदरणीय जीतेन्द्र भाई  बहुत बहुत आभार आपका /// सादर 

Comment by ram shiromani pathak on November 9, 2014 at 1:25pm

आदरणीय गोपाल जी बहुत बहुत आभार आपका /// सादर 

Comment by ram shiromani pathak on November 9, 2014 at 1:25pm

आदरणीय गिरिराज  जी बहुत बहुत आभार आपका /// सादर 

Comment by ram shiromani pathak on November 9, 2014 at 1:25pm
आदरणीय लक्ष्मण जी बहुत बहुत आभार आपका /// सादर

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 6, 2014 at 3:36pm

//बुढ़ापे का ज़ख्म अब रफ़ू करो।
आँसुओं को फिर से पानी कहो।।//

राम भाई इस शेर में ऐब है, बाकी मस्त मस्त, दाद देता हूँ। 

कृपया ध्यान दे...

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