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ये गाथा मजदूर की, जिसके नाना रूप।

पत्थर तोड़े हाथ से, बारिश हो या धूप।।

 

कड़ी धूप में पिस रही, रोटी की ले आस।

पानी की दो घूँट से, बुझा रही है प्यास।।

 

सर पर ईंटें पीठ पर, लादे अपना लाल।

मानवता कुछ ढूँढती, लेकर कई सवाल।।

 

वे भी जन इस देश के, करते हैं निर्माण।

पर खुद जीने के लिये, झोंके अपने प्राण।।

 

उनको हो सबकी तरह, जीने का अधिकार।

उनके कर्मठ हाथ हैं, विकास का आधार

-मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by शिज्जु "शकूर" on October 19, 2014 at 7:16pm

आदरणीया महिमा जी आपका तहेदिल से शुक्रिया रचना की सराहना के लिये

Comment by MAHIMA SHREE on October 19, 2014 at 7:12pm

बहुत ही प्रवाहमय दोहे .शिज्जू जी हार्दिक बधाई प्रेषित है ..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 19, 2014 at 7:08pm

आदरणीय हरिवल्लभ सर रचना की सराहना के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया


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Comment by शिज्जु "शकूर" on October 19, 2014 at 7:07pm

आदरणीय जितेन्द्र भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 19, 2014 at 7:07pm

आदरणीय गोपाल नारायण सर आपका हार्दिक आभार स्नेह यूँ ही बनाये रखें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 19, 2014 at 7:06pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर जी आपका हार्दिक आभार विलंब से आने के लिये माफी चाहता हूँ

Comment by harivallabh sharma on September 30, 2014 at 12:25pm

अति सुन्दर दोहे आदरणीय...श्रमिक व्यथा सोचने पर मजबूर करती है...सुन्दर भाव सम्प्रेषण हेतु बधाई आपको जनाब शिज्जू शकूर साहब.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 28, 2014 at 10:51pm

सटीक सुंदर दोहावली आदरणीय शिज्जू जी. बधाई आपको

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 28, 2014 at 12:57pm

शिज्जू जी बहुत अच्छे दोहे कहें आपने .विकास का अधिकार में लय कुछ बाधित है यह उन्नति का आधार भी हो सकता है . सादर .

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 28, 2014 at 10:39am
एक आदर्श प्रेरक गीत , आदरणीय शिज्जु शकूर जी , बधाई .

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