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चलो कि ज़िन्दगी को दें हम एक नाम नया -ग़ज़ल

1212 1122 1212 112/22

सफर ये राहगुज़र और ये मुकाम नया

हयात देती है अक्सर मुझे यूँ काम नया

 

अगर नसीब से बच पाये तो गनीमत है

यहाँ हर एक कदम पर है एक दाम नया         (दाम=जाल)

 

न जी सके अभी तक चलिये कोई बात नहीं                                               

करें अब के कोई जीने का एहतमाम नया

 

ये ज़िन्दगी हो फ़ना रोज़ और रोज़ शुरू

ग़ुरूबे शम्स हो तो चाँद निकले शाम नया

 

बहुत हुये गमे दौराँ की नज्मे ये शिकवे

चलो कहें कि मसर्रत का इक कलाम नया

 

ग़ुज़रते वक्त से चुनकर कोई पल ऐ हमराह

चलो कि ज़िन्दगी को दें हम एक नाम नया

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by शिज्जु "शकूर" on October 19, 2014 at 7:04pm

आदरणीय खुर्शीद जी आपका तहेदिल से शुक्रिया


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Comment by शिज्जु "शकूर" on October 19, 2014 at 7:04pm

आदरणीय राम शिरोमणी जी आपको देख कर बहुत अच्छा लग रहा है बहुत बहुत शुक्रिया रचना की सराहना के लिये


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Comment by शिज्जु "शकूर" on October 19, 2014 at 7:03pm

आदरणीय जितेन्द्र जी आपका हार्दिक आभार रचना पर आपकी उपस्थिति हमेशा हौसला बढ़ाती है स्नेह यूँ ही बनाये रखें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 19, 2014 at 7:02pm

आदरणीय सोमेश जी रचना को समय देने के लिये आपका हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 19, 2014 at 7:01pm

आदरणीय केवल प्रसाद सर आपका तहेदिल से शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 19, 2014 at 7:01pm

आदरणीय सुशील सर आपका बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by khursheed khairadi on October 13, 2014 at 10:38pm

अगर नसीब से बच पाये तो गनीमत है

यहाँ हर एक कदम पर है एक दाम नया  

आदरणीय शकूर साहब ,अच्छी ग़ज़ल हुई है ,दिली दाद कबूल फरमाएं 

Comment by ram shiromani pathak on October 13, 2014 at 9:16pm
वाह वाह वाह दिल खुश कर दिया आपने।। बहुत बधाई आपको
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 12, 2014 at 11:44pm

न जी सके अभी तक चलिये कोई बात नहीं                                               

करें अब के कोई जीने का एहतमाम नया........वाह! बहुत खूब. विशेष रूप से बधाई आदरणीय शिज्जू जी

 

Comment by somesh kumar on October 12, 2014 at 6:35pm

अच्छी गज़ल के लिए बधाई |

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