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कितने ही लोगों से हमने हाथ मिलाये

२१२२    २१२२     २११२२

 

कितने ही लोगों से हमने हाथ मिलाये

गम में डूबे जब भी कोई काम न आये

 

दिल तन्हा ये रो के अपनी बात बताये  

कैसे उल्फत हाय तन में आग लगाये

 

तोहफे में दे सका जो गुल भी न हमको

आज वही फूलों से मेरी लाश सजाये

 

जिनके दिल में गैरों की तस्वीर लगी है

करके गलबहिया वो सर सीने में छुपाये

 

दिल की बातें दिल ही जब समझे न यहाँ पर

क्यूँ  तन्हा फिर भीड़ में दिल खुद को न पाये

 

वो भी मिलता हमसे अंजानो कि तरह ही

जिसने बालू पर थे घर भी साथ बनाये

 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 19, 2014 at 10:24pm

वाह! आदरणीय डा. आशुतोष जी, बहुत ही खुबसूरत गजल कही आपने. दिली बधाई स्वीकारिये

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 19, 2014 at 4:25pm

आदरणीय अखिलेश भाईसाब ..बिलकुल सही मशविर दिया है .बहर में गलती हो गयी है मैं इसे संसोधित कर रहा हूँ ..मशविरे और उत्साह वर्धन के लिए तहे दिल धन्यवाद  सादर 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on May 19, 2014 at 1:40pm

आदरणीय आशुतोष भाई

खूबसूरत गज़ल की बधाई 

बहर का मुझे ज्ञान नहीं लेकिन प्रवाह और लय इसमें है ............

फूलों से वही आज मेरी लाश सजाये

सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 19, 2014 at 1:08pm

आदरणीय लक्ष्मण जी आपके स्नेहिल शब्दों के लिए तहे दिल आभार व्यक्त करता हूँ ..सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 19, 2014 at 1:05pm

आदरणीय कँवर जी .. मेरी रचना पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आपको तहे दिल धन्यवाद ..बस यूं ही आपका स्नेहस सदा मिलता रहे ..सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 19, 2014 at 1:03pm

आदरणीय सुरेंदा जी ..हौसला अफजाई के लिए तहे दिल धन्यवाद  सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 19, 2014 at 11:57am

शकील  भाई जी ..आपके स्नेहल शब्दों के लिए तहे दिल धन्यवाद ..सादर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 19, 2014 at 10:47am

आदरणीय आशतोष भाई जीतनी भी प्रशंसा करें वह कम कम है ... हार्दिक बधाई .

Comment by कंवर करतार on May 18, 2014 at 10:49pm

डॉ मिश्रा जी, जज्बातों को खूब पिरोया है -मरहबा मरहबा I

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 18, 2014 at 12:17pm

दिल की बातें दिल ही जब समझे न यहाँ पर

क्यूँ  तन्हा फिर भीड़ में दिल खुद को न पाये

सुन्दर जज्बात और इस जमाने से मिलते पुरस्कार डॉ आशुतोष जी बधाई
भ्रमर ५

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