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गजल : फिर हाल-ए-दिल हमारा सहेली से पूछना//शकील जमशेदपुरी

बह्र : 221/2121/1221/212
—————————————————————————
किरदार मेरा अपनी सहेली से पूछना
औ लम्स* मेरा अपनी हथेली से पूछना     *[स्पर्श]

मैं इक खुली किताब हूं तू खुल के बात कर
मुझसे न कोई बात पहेली से पूछना

पहले तो मुझसे कहना किसी और की हूं मैं
फिर हाल-ए-दिल हमारा सहेली से पूछना

बेदर्द वक्त कितना है हो जाएगा पता
खंडर हुई है कैसे हवेली से पूछना

खुशबू ​तुम्हारे जिस्म की है जानता 'शकील'
अच्छा नहीं सहन* की चमेली से पूछना       *[आंगन]
-शकील जमशेदपुरी

----------------------------------

*मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by वेदिका on April 20, 2014 at 12:11am
खूबसूरत गजल पर हार्दिक बधाई आदरणीय शकील भाई!
एक जिज्ञासा है- क्या खंडर शब्द का प्रयोग उचित हैहै?
सादर
Comment by vijay nikore on April 16, 2014 at 4:08pm

अच्छी गज़ल के लिए बधाई।

Comment by शकील समर on April 15, 2014 at 7:38pm

शुक्रिया gumnaam pithoragarhi और Mukesh Verma "Chiragh" जी।

Comment by शकील समर on April 15, 2014 at 7:37pm

आदरणीय गिरिराज सर, जब आप जैसे लोग सराहना करते हैं तो काफी हौसला मिलता है। आभार।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 15, 2014 at 6:12pm

आ. शकील भाई , बहुत खूब ॥ शानदार ग़ज़ल कही है , बधाइयाँ !!

बेदर्द वक्त कितना है हो जाएगा पता
खंडर हुई है कैसे हवेली से पूछना ---- ढेरों दाद !!

Comment by gumnaam pithoragarhi on April 15, 2014 at 5:37pm

किरदार मेरा अपनी सहेली से पूछना
औ लम्स* मेरा अपनी हथेली से पूछना

खूब सर जी ग़ज़ल अच्छी लगी बधाई

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on April 15, 2014 at 5:35pm

आदरणीय शकील जी

क्या खूब लिखा है आपने.

इस शेर की नज़ाकत पर हज़ारों दाद

खुशबू ​तुम्हारे जिस्म की है जानता 'शकील'
अच्छा नहीं सहन* की चमेली से पूछना       *[आंगन]

ग़ज़लगोई का शानदार मुज़ाहिरा किया है आपने.

Comment by शकील समर on April 15, 2014 at 3:42pm

आप सभी का बहुत—बहुत आभार इस हौसला अफजाई के लिए।

Comment by Meena Pathak on April 15, 2014 at 2:31pm

क्या बात है .. बहुत खूब .. बधाई

Comment by भुवन निस्तेज on April 15, 2014 at 2:04pm

बेदर्द वक्त कितना है हो जाएगा पता
खंडर हुई है कैसे हवेली से पूछना

बड़े ही खूबसूरत अंदाज़ की इस ग़ज़ल पर दाद कबूल करें...

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