For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

गजल : हम भी तेरी याद में रोए, ये भी तुमको मालुम हो//शकील जमशेदपुरी//

बह्र : मात्रिक बह्र

________________________________

तुम तड़पी तो हम भी तरसे, ये भी तुमको मालुम हो
तुमसे ज्यादा हम टूटे थे, ये भी तुमको मालुम हो

तुमको इसका दुख है तुमने, मेरे खातिर दर्द सहा
हम भी तेरी याद में रोए, ये भी तुमको मालुम हो

मेरा ऊँचा बंगला जाने, दुनिया को क्यों खलता है
एक समय था दर-दर भटके, ये भी तुमको मालुम हो

बस देख के उनकी सूरत को, उनको अच्छा मत जानो
इक चेहरे पे कितने चेहरे, ये भी तुमको मालुम हो

राह में मेरी फूल बिछे तो, कहते हो तुम किस्मत है
पांव में कितने चुभे थे कांटे, ये भी तुमको मालुम हो

रिश्ता बनना खेल नहीं है, बनते बनते बनती है
लेकिन कैसे रिश्ते निभते, ये भी तुमको मालुम हो

-शकील जमशेदपुरी

____________________________________

*मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 567

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 23, 2014 at 4:08pm

ग़ज़ल के लिए बधाई, भाईजी.

मालूम को मालुम कह सकते हैं ? यदि हां तो ढेर सारी बधाइयाँ.

एक बात :

रिश्ता पुल्लिंग है.

Comment by विजय मिश्र on March 6, 2014 at 5:44pm
"मेरा ऊँचा बंगला जाने, दुनिया को क्यों खलता है
एक समय था दर-दर भटके, ये भी तुमको मालुम हो

बस देख के उनकी सूरत को, उनको अच्छा मत जानो
इक चेहरे पे कितने चेहरे, ये भी तुमको मालुम हो

- क्या खूब कहा शकील भाई ,तबियत खुश हो गयी |दिली दाद कुबूलें |
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 5, 2014 at 11:30pm

राह में मेरी फूल बिछे तो, कहते हो तुम किस्मत है
पांव में कितने चुभे थे कांटे, ये भी तुमको मालुम हो...........यह शेर बहुत खास हुआ, ढेरों बधाइयाँ आदरणीय शकील साहब

Comment by Anita Maurya on March 5, 2014 at 6:01pm

राह में मेरी फूल बिछे तो, कहते हो तुम किस्मत है
पांव में कितने चुभे थे कांटे, ये भी तुमको मालुम हो.. बहुत सुन्दर 

Comment by Meena Pathak on March 4, 2014 at 10:11am
Kyaa Baat hai, Bahut khoob ... Badhiyan
Comment by Saarthi Baidyanath on March 4, 2014 at 8:55am

राह में मेरी फूल बिछे तो, कहते हो तुम किस्मत है
पांव में कितने चुभे थे कांटे, ये भी तुमको मालुम हो....इस शे'र के लिए दिली दाद ! एक बढ़िया ग़ज़ल हुई है जनाब ! मुबारकबाद !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 3, 2014 at 7:24pm

आदरणीय शकील भाई , बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥ आदरणीय ' रिश्ता ' पुल्लिंग शब्द है , आखरी शे र देख लीजियेगा ॥

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Thursday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service