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कैसे भूलाऐ जा पाऐगे

बचपन की वो सुन्दर यादें
गांव की मिट्टी,पेड़ों के झूले
कैसे भूलाए जा पाऐगे
रोना,हसना,और मचलना
गिरना,गिरकर फिर से संभलना
कैसे भूलाए जा पाऐगे
पगडन्डी पर दौड़ लगना
खुली हवा से बातें करना
कैसे भूलाए जा पाऐगे
तितली,बन्दर और गिलहरी
मोदक,मक्खन और जलेबी
कैसे भूलाए जा पाऐगेम
माँ की रोटी,दादी की कहानी
छुटपन की सहेली मीना,रानी
कैसे भूलाऐ जा पाऐगे
बाबू जी का डान्ट लगाना
और प्यार से गोद उठाना
कैसे भूलाऐ जा पाऐगे
सावन के झूले ,अमवा की डाली
वो पनघट,वो हरियाली
कैसे भूलाऐ जा पाऐगो

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 23, 2014 at 8:24am

आ० प्रज्ञा श्रीवास्तव जी ,

जिन पलों में श्वास लेती ज़िंदगी अपना सफ़र तय करती है, उन्हें भुलाया जा सकना मुमकिन ही नहीं .... फिर इस सपाटबयानी को कविता प्रारूप देने के लिए क्या कुछ और गहन एहसासों को संग ही संजो देना सही न होता,,,,

यानि... ये अभिन्न पल रचनाकार के लिए क्या मायने रखते हैं? या उन्हें भुला देने ऐसी की विवशता ही क्यों? या फिर क्या होगा यदि इनसे अलग हो जाना पड़े.... तो कविता अपने अर्थ में पूर्णता पाती...

इस प्रयास पर मेरी शुभकामनाएं 

Comment by Pragya Srivastava on April 16, 2014 at 11:48pm
आ.शरदिन्दु जी,शिज्जू जी क्षमा करें ।अब कविता लिखने के बाद एक बार ध्यान से पढ़ने के बाद ही पोस्ट करूँगी।
Comment by बृजेश नीरज on April 16, 2014 at 11:39pm

अच्छा प्रयास है! आपको बधाई!

//कैसे भूलाए जा पाऐगे// यह वाक्य सही नहीं है!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 15, 2014 at 5:41pm

आदरणीया प्रज्ञा जी , भाव अभिव्यक्ति बहुत सुन्दर हुई है , आपको बधाइयाँ !! आ. शरदिन्दु जी की बातों का ज़रूर ख्याल कीजियेगा !!

Comment by Meena Pathak on April 15, 2014 at 2:18pm

सुन्दर ... पर वही बात मै भी कहूँगी जो आ० शरदिंदु  सर जी और आ० शिज्जू जी कह रहे हैं | सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 15, 2014 at 7:49am

आदरणीया भाव अच्छे हैं, शेष मैं आदरणीय शरदिंदु सर की बातों से इत्तेफाक रखता हूँ भाषा या व्याकरण की अशुद्धि कविता के रस को फीका कर देते हैं।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on April 15, 2014 at 12:55am
आदरणीया, आपके कवि मन के अंदर भावनाओं का जो अम्बार है उसे अभिव्यक्ति देने के समय आपकी लेखनी बेसब्र हो उठती है...ऐसा मुझे प्रतीत होता है. उदाहरणार्थ //कैसे भूलाए जा पाऐगे//...//रोना,हसना,और मचलना//.....//कैसे भूलाए जा पाऐगेम//.....//बाबू जी का डान्ट लगाना//.....//कैसे भूलाऐ जा पाऐगो// इन सभी उद्धृत पंक्तियों में कहीं न कहीं गलती है. इतनी ग़लती रहने से किसी भी रचना का आनंद फीका पड़ जाता है. आपसे अनुरोध है कि आराम से बैठकर अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले अच्छी तरह पढ़ लें और अशुद्धियों को ठीक कर लिया करें....आपकी रचना का स्तर स्वत: कुछ ऊपर आ जाएगा. अपना प्रयास जारी रखें. हार्दिक शुभकामनाएँ.
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 14, 2014 at 11:36pm

सच! बचपन के वो मासूमीयत से भरे वो दिन, शायद उम्र के किसी भी पड़ाव पर नही भुलाए जा सकते. बहुत सुंदर रचना, बधाई स्वीकारें आदरणीया प्रज्ञा जी

Comment by Anurag Singh "rishi" on April 14, 2014 at 7:20pm

वाह सुन्दर रचना

Comment by Shyam Narain Verma on April 14, 2014 at 5:19pm

सुंदर रचना के लिए बहुत बधाई .........................

सादर....................

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