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2122       2122       212 

फाइलातुन   फाइलातुन   फाइलुन

(बहरे रमल मुसद्दस महजूफ)

वृत्ति जग की क्लिष्ट सी होने लगी

सोच सारी लिजलिजी होने लगी

भीड़ है पर सब अकेले दिख रहे 
भावनाओं में कमी होने लगी

चाहना में बजबजाती देह भर 
व्यंजना यूँ प्रेम की होने लगी

धर्म के जब मायने बदले गए 
नीति सारी आसुरी होने लगी

सूखती संवेदना घर-घर दिखे 
चेतना भी ठूँठ सी होने लगी

 

ढूँढ अब लाएँ कहाँ से हम किरण

रात सारी मावसी होने लगी

      -  बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by बृजेश नीरज on March 2, 2014 at 11:19pm

आदरणीय अनिल भाई आपका हार्दिक आभार!

Comment by अनिल कुमार 'अलीन' on March 2, 2014 at 8:35pm

धर्म के जब मायने बदले गए नीति सारी आसुरी होने लगी

सूखती संवेदना घर-घर दिखे चेतना भी ठूँठ सी होने लगी...............बहुत खूब सर...............

Comment by बृजेश नीरज on March 2, 2014 at 6:07pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी आपका हार्दिक आभार! माहिरी नहीं, अभी तो प्राथमिक कक्षा का ही विद्यार्थी हूँ! आप लोगों की देखा-देखी कुछ कलम चल गयी इस बार.

सादर!

Comment by बृजेश नीरज on March 2, 2014 at 5:56pm

आदरणीया मीना जी आपका हार्दिक आभार!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 2, 2014 at 5:17pm

सूखती संवेदना घर-घर दिखे 
चेतना भी ठूँठ सी होने लगी-----वाह वाह कमाल का शेर----

,छंद कविता नव सृजन के साथ में  ,अब ग़ज़ल में माहिरी होने लगी 

 बहुत अच्छी ग़ज़ल शानदार अशआर लिखने लगे अब ब्रजेश जी बधाई के साथ मेरी शुभकामनायें भी. 

Comment by Meena Pathak on March 2, 2014 at 1:11pm
Bahut sundar Gazal ..Bahut Bahut Badhai, Saadar
Comment by बृजेश नीरज on March 2, 2014 at 12:15pm

आदरणीय विजय निकोर जी, आपका बहुत-बहुत आभार!

Comment by बृजेश नीरज on March 2, 2014 at 12:14pm

आदरणीय गिरिराज जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by vijay nikore on March 2, 2014 at 11:17am

अच्छी गज़ल के लिए बधाई, आदरणीय बृजेश जी।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 2, 2014 at 9:12am

आदरणीय बृजेश भाई , बहुत खूब सूरत ग़ज़ल कही है , आपको दिली मुबारक़ बाद ॥ आदरणीय , सभी शे र बहुत उम्दा कहे हैं ॥ पूरी ग़ज़ल के लिये ढेरों दाद ॥

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