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धीरे-धीरे समझे हम

इस दुनिया के तौर तरीके

धीरे धीरे समझे हम

गुलदस्तों की ओट में खंजर

धीरे-धीरे समझे हम|  

जोश बड़ा था होश नहीं था

हद से आगे गुजरे हम

हद से आगे जो होता है  

धीरे-धीरे समझे हम|

 

जो भी मिल गए

अपने बन गए

रिश्ते खूब निभाये हम

रिश्तेदारों की हकीकत     

धीरे-धीरे समझे हम|

बीत गयी हर बात पुरानी

एक कहानी बन गए हम

 फंतासी हैं रिश्ते नाते

धीरे-धीरे समझे हम|

शहद समझकर हंसकर पी गए

जहर के कितने प्याले हम

किश्तों में फिर मौत का आना

धीरे-धीरे समझे हम| 

 

दर्पण का दिल चटक गया

जब इसके भीतर झांके हम

हजार मुखोटे एक चेहरे पर

धीरे-धीरे समझे हम| 

मेहनत करके हारा है जो

उसे नकारा समझे हम

मेहनतकश की पीर कहां है

धीरे-धीरे समझे हम| 

(मौलिक और अप्रकाशित) 

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Comment

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 11, 2017 at 5:36pm

बहुत सुंदर प्रस्तुति |

Comment by Gul Sarika Thakur on February 1, 2014 at 7:18am

प्रबुद्ध सुधीजनो के इस मार्ग दर्शन से अभिभूत हूँ, लम्बे समय तक मुक्त छ्न्द में लिखने के उपरांत अनुभव हुआ कि काव्य में छ्न्द भी अति महत्वपूर्ण है, सहमत हूँ शिल्प दोष अवश्य होंगे... बहुत ही आभारी रहूँगी अगर सुधीजन भूल सुधार भी कर दें... . आभार


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 1, 2014 at 2:00am

बहुत दिनों पर आपकी रचना से गुजर रहा हूँ. आपके भावशब्दों में रुहानी ताकत है लेकिन रचनाकर्म प्रस्तुति के अलावे एक साधना भी है जिसमें कुछ कहने का ढंग यानि शिल्प भी अर्थ रखता है. तब तो और, जब रचनाकार शाब्दिक प्रवाह के व्यामोह में दिखे.
अरुन अनन्तभाई के कहे से मैं भी सहमत हूँ.
शुभेच्छाएँ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 27, 2014 at 3:53pm

दुनियादारी, रिश्ते नातों, अपनों परायों के उलझे जाल को समझने की चेष्टा करती अभिव्यक्ति...

शिल्प के स्तरपर अभी कुछ और वक़्त दिए जाने की ज़रुरत है इस रचना पर.

शुभकामनाएं  

Comment by अजय कुमार सिंह on January 26, 2014 at 2:21am

भाई अरुन शर्मा 'अनन्त' जी की बात से सर्वथा सहमत हूँ. पहले पद का प्रवाह यदि सम्पूर्ण रचना में होता तो क्या ही उत्तम रचना होती. फिलहाल, भावपूर्ण रचना के सृजन पर बधाई स्वीकारें आदरणीया |

Comment by ajay sharma on January 25, 2014 at 9:58pm

इस दुनिया के तौर तरीके

धीरे धीरे समझे हम

गुलदस्तों की ओट में खंजर

धीरे-धीरे समझे हम|  .....wah wah kya kahan hai apka ..........bahut hi sunder 

Comment by Priyanka singh on January 25, 2014 at 6:49pm

जोश बड़ा था होश नहीं था

हद से आगे गुजरे हम

हद से आगे जो होता है  

धीरे-धीरे समझे हम|

दर्पण का दिल चटक गया

जब इसके भीतर झांके हम

हजार मुखोटे एक चेहरे पर

धीरे-धीरे समझे हम| 

मेहनत करके हारा है जो

उसे नकारा समझे हम

मेहनतकश की पीर कहां है

धीरे-धीरे समझे हम| ........आदरणीया सारिका जी ....बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना कही अपने...... बहुत बहुत बधाई आपको 

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 24, 2014 at 11:32am

आदरणीया सारिका जी रचना ने बहुत ही सुन्दर भाव पिरोये हैं आपने प्रथम दो पंक्तियों में जो प्रवाह है यदि वही सम्पूर्ण रचना में होता तो आनंद आ जाता. खैर इस रचना पर ढेरों बधाइयाँ स्वीकारें.

Comment by Gul Sarika Thakur on January 23, 2014 at 10:59pm

Abhaar Nadir Khan Sahab...

Comment by नादिर ख़ान on January 23, 2014 at 9:48pm

शहद समझकर हंसकर पी गए

जहर के कितने प्याले हम

किश्तों में फिर मौत का आना

धीरे-धीरे समझे हम| 

 

दर्पण का दिल चटक गया

जब इसके भीतर झांके हम

हजार मुखोटे एक चेहरे पर

धीरे-धीरे समझे हम| 

 आदरणीया   सारिका जी इस उम्दा रचना के लिए आपको कोटिशः बधाईयाँ..

दिल को छू लेने वाली शानदार अभिव्यक्ति ....

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