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आँख कान और जुबान की सांकल खुले तो

पूछना उनसे

जिंदाबाद का नारा लगानेवालों में

कितने ज़िंदा थे यकीनन|  

पूछना आँखे खुल जाने के बाद

रोज निगली जाने वाली मक्खियों का स्वाद

पूछना वर्तनी उन गालियों का

जिसके एक छोर पर माँ तो दूसरे छोर पर

अक्सर बहने हुआ करती है|  

मगर मत पूछना जुबान से

उस मांसल देह का स्वाद

जिसकी कन्दराओं में ना जाने

कितनी माँए और बहने दुबकी होती है

मगर एक बार पूछना जरुर

इन सांकलों के खुल जाने के बाद

 खुदा बनकर वे  खामोश क्यों रह गए?  

Gul sarika 

(मौलिक एवं अप्रकाशित) 

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Comment

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 11, 2017 at 5:33pm

आपकी लेखनी को नमन आदरणीय | गज़ब का चिंतन किया है यहाँ आपने | 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on May 1, 2014 at 1:59am
आदरणीया गुल सारिका जी, आपकी लेखनी की सशक्तता और चिंतन की स्वतंत्रता से उत्पन्न इस रचना की गहराई ने झकझोर दिया. आपकी रचनाओं की व्यग्र प्रतीक्षा रहेगी.
Comment by vijay nikore on April 17, 2014 at 7:04am

अति संवेदनशील अभिव्यक्ति। हम सब मिल कर प्रार्थना कर लें।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 17, 2014 at 12:43am

प्रश्न ही प्रतिप्रश्न बन कर प्रश्न करता हम-आप से !  आपकी लेखिनी के साहस को नमन, आदरणीया..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 5, 2014 at 9:42pm

बहुत सार्थक सशक्त अभिव्यक्ति आ० गुल सारिका जी 

हृदय से बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on April 4, 2014 at 3:25pm
इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई...............

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