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यहाँ परछाईयों का सौदा होता है
हर चीज यहाँ बिकाऊ है
हर पल तमाशा लगता है
तुम अपना दाम कहो
छुप के नहीं खुले आम कहो
क्या लोगे अपनी यारी का
क्या लोगे अपनी दिलदारी का
मेरा गम लोगे कितने में
तुम प्यार करोगे कितने में
सब जज़बात तुम मेरे नाम करो
हमराही तुम अपना दाम कहो
पर दाम चुकाने के खातिर
हम अपनी जेब टटोलें तो
बस प्यार मिलेगा बहुत सारा
पर ये सिक्के अब कहाँ चलते हैं
ये दुनिया बे-एतबारी की .....
ये अर्ज है हर व्यापारी की ....


मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on November 14, 2013 at 7:28pm

भाव और प्रवाह सभी मुग्ध कर रहे हैं बार बार पढ़े जाने लायक रचना , हार्दिक बधाई आदरणीय !!

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 14, 2013 at 3:55pm

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति अंतिम पंक्तियाँ अत्यंत खूबसूरत हैं बधाई स्वीकारें

बस प्यार मिलेगा बहुत सारा
पर ये सिक्के अब कहाँ चलते हैं
ये दुनिया बे-एतबारी की .....
ये अर्ज है हर व्यापारी की

Comment by Meena Pathak on November 14, 2013 at 12:12pm

बहुत सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति | हार्दिक बधाई स्वीकारें | सादर 

Comment by Akhand Gahmari on November 14, 2013 at 11:57am

दम हैं

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 14, 2013 at 11:54am

आपकी बात और है  वर्ना कहाँ मिलता है प्यार

पर  आपके  प्यार   पर  हमें  है  ऐतबार  I

Comment by Sushil.Joshi on November 14, 2013 at 5:25am

वाह.... सुंदर एवं सार्थक रचना है आ0 अमोद जी.... आज के परिपेक्ष्य को उजागर करती हुई जहाँ सचमुच हर चीज़ बिकाऊ है...... यहाँ तक कि रिश्ते नाते भी...... बधाई इस रचना हेतु....

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