For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

देहरी पर मन के

किसने रख दिए दो पाँव,

बस गया दो पल में जैसे

एक सुन्दर गाँव!

 

गुप्तचर आँखों ने ढूंढें

रूप के कुछ ठौर,

मन अपेक्षी हर कदम

कहता रहा, कुछ और.

कब मिले जाने इसे अब

कोई अंतिम ठांव!

 

चितवनों के गाँव में

बिखरे अगिन संकेत,

किन्तु जल की आड़ में

छलती गयी है रेत.

रूपसी खेलेगी मुझसे 

और कितने दांव!

 

ले नदी सब नीर अपना

चल पड़ी किस ओर,

चंचला लहरों ने थामी

चांदनी की डोर.

झिलमिलाती चल रही है

ज़िंदगी की नाव!

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 434

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 11, 2013 at 9:28pm

वाह वाह .. .

इस उन्नत भाव-दशा को इतने सार्थक शब्द मिले हैं कि मन मुग्ध है.

मन की देहरी पर ठिठके किन्हीं दो पाँवों की यात्रा जो प्रारम्भ होती है वो उत्तरोत्तर रोचक होती चली जाती है. लेकिन कई बिम्ब एकदम से रोकते हैं और मन देर तक उनके गिर्द झूमता है. इस दुलकी यात्रा के दौरान दृश्यों का सुन्दर रुपायन होता है, भाईजी.

बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें.

शुभम्


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 6, 2013 at 9:51pm

बहुत सुन्दर गीत 

गीत के स्थाई में कही गई बात को अंतरे ने और आगे बढाया| बिम्बों और संकेतों ने गीत को नै उंचाइयां दी हैं|

हार्दिक बधाई|

मंच पर गीतों की बयार चल पड़ी है ..मैं अभिभूत हूँ|

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 6, 2013 at 5:12pm

आपके स्रजनात्मक जीवन की नाव यूँ ही चलती रहे,सुन्दर भाव लिए कविता बनती रहे श्री सौरभ श्रीवास्तव जी

हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाए  

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 6, 2013 at 10:30am

वाह आदरणीय सौरभ जी बेहद सुन्दर भावाविभक्ति बेहद सुन्दर पंक्तियाँ इस सुन्दर गीत पर दिल से बधाई स्वीकारें.

चंचला लहरों ने थामी

चांदनी की डोर. इन पंक्तियों पर विशेष तौर से बधाई स्वीकारें आदरणीय

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 6, 2013 at 9:27am

आदरणीय सौरभ श्रीवास्तव जी,

सुंदर , सहज रचना पर आपको हार्दिक बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 6, 2013 at 9:21am

बहुत सुन्दर सहज शब्द चयन, सुन्दर भाव, सुप्रवाहित गठन...हार्दिक बधाई इस सुन्दर सृजन के लिए.

शुभकामनाएँ 

Comment by वेदिका on August 6, 2013 at 8:49am

ले नदी सब नीर अपना

चल पड़ी किस ओर,

चंचला लहरों ने थामी

चांदनी की डोर.

झिलमिलाती चल रही है

ज़िंदगी की नाव!

प्राकृतिक बिम्बों का सहारा लेकर मन की सारी बात कह डाली,,, सुंदर सुंदर

शुभकामनाये आदरणीय सौरभ जी! 

Comment by Pankaj Trivedi on August 6, 2013 at 7:49am

अदभूत गीत ! वाह !  एक सुन्दर गाँव ...

Comment by Abhinav Arun on August 6, 2013 at 4:58am

बहुत सुन्दर आनंदित हूँ ऐसा गीत पढके श्री सौरभ जी , बहुत बहुत बधाई इस सशक्त सृजन पर --

चितवनों के गाँव में

बिखरे अगिन संकेत,

किन्तु जल की आड़ में

छलती गयी है रेत.

रूपसी खेलेगी मुझसे 

और कितने दांव!

क्या मंज़र कशी है वाह वाह बेहद उम्दा !!

Comment by विवेक मिश्र on August 6, 2013 at 12:17am
अहा। क्या सुन्दर गीत हुआ है। मुखड़ा सुनकर ही प्रभावित हुए बिना नहीं रहा जा सकता। तिस पर लय ऐसी कि पूरा गीत एक सांस में पढ़ गया। इस भावपूर्ण सृजन के लिए हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

आशीष यादव added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
Thumbnail

चल मन अब गोकुल के धाम

चल मन अब गोकुल के धाम अद्भुत मनहर बाल रूप में मिल जाएंगे श्याम कि चल मन अब……………………….कटि करधनी शीश…See More
6 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अशोक भाईजी धन्यवाद ... मेरा प्रयास  सफल हुआ।"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह वाह वाह !!! बहुत दिनों बाद ऐसी लाजवाब प्रतिक्रिया पढने में आई है। कांउटर अटैक ॥ हजारों धन्यवाद…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी सादर, सरकारी शालाओं की गलत परम्परा की ओर ध्यान आकृष्ट कराती…"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"सार्थक है आपका सुझाव "
Tuesday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ रचना पटल पर उपस्थिति और समीक्षाओं हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी। मेरी…"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभाजी ।  इसमें कुछ कमी हो सकती है लेकिन इस प्रकार के आयोजन शहरों…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब सादर, बिना सोचे बोलने के परिणाम पर सुन्दर और संतुलित लघुकथा…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"अमराई में उत्सव छाया,कोयल को न्यौता भिजवाया। मौसम बदले कपड़े -लत्ते, लगे झूमने पत्ते-…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"ठण्ड गई तो फागुन आया। जन मानस में खुशियाँ लाया॥ आम  लगे सब हैं बौराने। पंछी गाते सुर में…"
Tuesday
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"लघुकथा किसी विसंगति से उभरती है और अपने पीछे पाठको के पीछे एक प्रश्न छोड़ जाती है। सबकुछ खुलकर…"
Tuesday
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अखिलेश जी स्वयं के प्रचार प्रसार के लिए इस तरह के प्रायोजित कार्यक्रमों का चलन साहित्य और…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service