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मंजिल को पाने की चाह में

मंजिल को पाने की चाह में

इस कदर हम खो गए

मंजिल मिली मगर

तन्हा हम हो गए

 

रास्ते चलते रहे

फांसले बढ़ते गए

 

छूटते इस साथ को

हमने कभी चाहा था बहुत

 

वो हमारे थे मगर

अब किसी और के हो गए

 

 

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on July 10, 2013 at 8:03pm

सुन्दर अभिव्यक्ति.

Comment by D P Mathur on July 4, 2013 at 8:14am

मंजिल को पाने की चाह में
इस कदर हम खो गए
मंजिल मिली मगर
तन्हा हम हो गए
आदरणीया प्रज्ञा जी , सुन्दर रचना की बधाई !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on July 3, 2013 at 9:09pm

मन से निकले सहज भाव, अति सुंदर...........

Comment by Sumit Naithani on July 3, 2013 at 2:39pm

सुंदर पंक्तियाँ 

Comment by Admin on July 3, 2013 at 10:05am

//शायद ये पंक्तियाँ कही पढ़ी है मैंने आदरणीया प्रज्ञा जी //

श्री राम शिरोमणि जी, कृपया अपने कथ्य के समर्थन में प्रसंग का उल्लेख करें, प्रसंग न होने की स्थिति में इस तरह की बातें न लिखें, आप जानते हैं कि ओ बी ओ पर केवल "मौलिक व अप्रकाशित" रचना ही स्वीकार्य है ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 3, 2013 at 9:54am

Pragya ji ये लग रहा है कि जज़्बात दिल से निकले, शब्दों का रूप लिया, ग़ज़ल बन गयी.  अच्छी कोशिश,  keep going and improve yourself, all the best. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 3, 2013 at 9:48am

आदरणीय पाठक जी, ये भी बताने का कष्ट करें कि कहाँ पढ़ी है बुरा ना मानिए ये ओपन मंच है यहाँ इस तरह  की टिप्पणी आप करते है तो आपके पास रेफरेन्स भी होना चाहिए, पाठकजी  इस तरह बीच मे बोलने के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ, रहा नही गया इसलिए बोल रहा हूँ. 

Comment by Amod Kumar Srivastava on July 3, 2013 at 7:36am

सुंदर रचना के लिए बधाई .....

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 3, 2013 at 2:25am
"रास्ते चलते रहे

फांसलेबढ़ते गए

छूटते इस साथ को

हमने कभी चाहा था बहुत

वो हमारेथे मगर

अब किसी और के हो गए"........आदरणीया..प्रग्या जी, सुंदर व भावना से ओत प्रोत मर्मस्पर्शी रचना के लिए बधाई वशुभकामनाऐं

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