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जाने क्यो उदास है

मेरा मन

जाने क्यों निराश है

मेरा मन

जाने क्यों हताश है

मेरा मन

अधरों से फूटते नही बोल

घुटन सी होती है इस मन में

चुभन सी होती है इस तन में

चंचलता से भरा मेरा मन

जाने क्यों उदास है

लगता है ऐसे कोई नही

अपना आस-पास है

अपनों को खोजता ये मन

लिए तड़पन, लिए लगन

आँसूओं की धारा में

गुम-सुम हुआ मेरा मन

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 1, 2013 at 7:43pm

मन में अंतर्द्वंद की सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई 

Comment by vijay nikore on July 1, 2013 at 2:08am

मन में सदैव रहते द्वंद्व और घुटन का अच्छा चित्रण किया है।

बधाई।

सादर,

विजय निकोर

Comment by Dr Babban Jee on June 30, 2013 at 12:23am

A soothing creation ! well written

Comment by coontee mukerji on June 29, 2013 at 6:18pm

अधरों से फूटते नही बोल

घुटन सी होती है इस मन में

चुभन सी होती है इस तन में

चंचलता से भरा मेरा मन

जाने क्यों उदास है

लगता है ऐसे कोई नही

अपना आस-पास है

अपनों को खोजता ये मन.......कहते हैं मन को जब तक उसका जू‌ड़वाँ साथी नहीं मिल जाता वह इसी तरह भटकता रहता है.

Comment by विजय मिश्र on June 29, 2013 at 5:43pm
"लगता है ऐसे कोई नही
अपना आस-पास है
अपनों को खोजता ये मन |" -- कितनी सुंदर कविता कही ! भाव प्रणव है .साधुवाद प्रज्ञाजी .
Comment by Shyam Narain Verma on June 29, 2013 at 4:15pm

बहुत ही सुंदर व मर्मस्पर्शी रचना..........................

Comment by Pragya Srivastava on June 29, 2013 at 3:20pm

रविकर जी,.....शुक्रिया

Comment by Pragya Srivastava on June 29, 2013 at 3:18pm

श्रीराम जी,......शुक्रिया

Comment by Pragya Srivastava on June 29, 2013 at 3:17pm

जितेंद्र जी,...शुक्रिया

Comment by Pragya Srivastava on June 29, 2013 at 3:16pm

रामकुमार जी ,..........शुक्रिया

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