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घर लौटकर पूत विदेश से

माँ से बोला बड़े प्यार से, 

आया मै तुमको लेने माँ

यहाँ अकेली अब न रहना |

इस घर को अब बेच चलेंगे

खाली घर में भूत बसे माँ,

संग में मेरे अब तू रहना

उम्र नहीं यह तन्हा रहना |

उमडा उसपर माँ का प्यार,

बेच दिया सारा घरबार,

पोर्ट पर जाकर माँ से बोला-

माँ तू यहाँ पर बैठे रहना |

माँ बोली क्या बात है बेटा

पूत कहे कुछ बात नहीं है,

सामान की है जांच कराना,

माँ बोली जा, जल्दी आना |

रात बिताई बैठे बैठे,

हुई भौर चिंता में डूबी,

सफाई कर्मी से माँ यूँ बोली,

मै इंतज़ार कर रही बेटे का |

कितनी जांच अभी बाकी है-

उसके साथ विदेश में जाना,

सफाई कर्मी धीरे से बोला-

पूत तुम्हारा चलागया है,

तुमको यही वह छोड़ गया है|

आहे भर कर माँ यूँ बोली-

मेरे बेटे तुम खुश रहना.

माँ को आता सब कुछ सहना,

मेरा दुःख मुझको ही सहना|

सफाईकर्मी से वह बोली -

यह बात किसी से ना कहना,

और भी बेटे यहाँ बहुत है

उनको होगी मुश्किल सहना,

माँ को आता सब कुछ सहना|

-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला 

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Comment

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 15, 2013 at 9:03pm

आ0 लड़ीवाला जी,   वाह सर जी!  क्या खूब बयां किया। बहुत ही मार्मिक और दिल को छू जाने वाली रचना।  हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर,

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 15, 2013 at 7:10pm

रचना मर्म स्पर्श कर पायी, लिखना सार्थक हुआ, आपका हार्दिक आभार श्री बसंत नेमा जी, और

 श्री राम शिरोमणि पाठक जी 

Comment by Shyam Narain Verma on May 15, 2013 at 6:19pm
इस प्रस्तुति हेतु बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ.
Comment by ram shiromani pathak on May 15, 2013 at 3:40pm

आदरणीय बहुत ही मर्म स्पर्शि रचना... बधाई 

Comment by बसंत नेमा on May 15, 2013 at 3:38pm

सही कहाँ है माँ सब कुछ सह सकती है.......... बहुत खूब ... एक मर्म स्पर्शि रचना... बधाई 

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