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अँधेरे में डूबकर
सन्नाटे से बतियाता
वो वीराना
समय से दौड़ में पिछड़ा
वह बेबस, कर्महीन खंड है
जो आजकल
बड़ा घबराया हुआ है उस
विशिष्ट उजाले की आहट सुनकर
जो उसके भाग्य की कालिमा
को धोने नहीं बल्कि उसे दुनिया के
सामने उजागर कर उसका
मजाक उड़ाने आनेवाला है।

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Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on March 17, 2013 at 10:34am
आदरणीय गुरुदेव, आपको बार-बार धन्यवाद कह रहा हूँ।

जिन भावनाओं के साथ मैंने ये कविता लिखी थी, आपने पूरी तरह उनको समझा और अपनी प्रतिक्रिया में निरूपित किया है। आपके स्नेह से एकबार फिर प्रोत्साहित हुआ हूँ। बहुत-बहुत आभार।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 16, 2013 at 1:20am

अरे बाप रे.. .   क्या-क्या सोच लेते हो भाई.. .  रीढ़ में बर्फ़ की पिघलन महसूस हुई.

अविश्वास और अन्यमनस्कता की बढिया अभिव्यक्ति के लिए बधाई. 

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on March 14, 2013 at 8:03am

आपका हार्दिक स्वागत है आदरणीया वंदना तिवारी जी। रचना की सराहना हेतु आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on March 14, 2013 at 8:02am

बहुत दिनों बाद आपसे बात करने का मौका मिला आदरणीय योगी जी। आपका स्नेह पाकर मन प्रसन्न हुआ। बहुत-बहुत आभार।

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on March 14, 2013 at 8:00am

आपका स्नेह तो सदा प्रोत्साहित करता है आदरणीय लक्ष्मण सर। हार्दिक आभार।

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on March 14, 2013 at 7:59am

स्वागत है आपका आदरणीय विजय निकोर सर। बहुत-बहुत धन्यवाद। 

Comment by Vindu Babu on March 13, 2013 at 4:37pm
आदरणीय कुमार गौरव जी क्या समंजस्य बनाया है शब्दों और भावों के मध्य!
विशिष्ट उजाला....कालिमा को उजागर करने वाला ही नही बल्कि मजाक भी उड़ाने वाला...
बहुत सुन्दर!
सादर
Comment by Yogi Saraswat on March 13, 2013 at 2:22pm

बहुत सुन्दर भाव और उतने ही सुन्दर शब्द श्री कुमार गौरव जी

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 13, 2013 at 1:21pm

अच्छे भाव रचना के लिए बधाई श्री कुमार गौरव अजितेंदु जी, हार्दिक बधाई स्वीकारे 

Comment by vijay nikore on March 13, 2013 at 1:10pm

आदरणीय कुमार गौरव जी:

 

शूरू से अंत तक भाव आपस में बंधे हुए हैं,

रचना अच्छी बनी है।

 

सादर ,

विजय निकोर

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